Search for:

वैकुंठ चतुर्दशी आज

वैकुंठ चतुर्दशी आज
********************
कार्तिक में वैकुंठ चतुर्दशी ऐसा दिन है जब विष्णु-शिव की एकसाथ पूजा की जाती है, इससे व्रती को स्वर्ग मिलता है।
कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को वैकुंठ चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। इस पर्व पर हरि-हर मिलन यानी भगवान शिव और विष्णुजी की औपचारिक मुलाकात करवाने की परंपरा है।
बैकुंठ चतुर्दशी के दिन व्रत-पूजा करने वालों को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। विष्णु और शिव जी के आशीर्वाद से उनके समस्त पाप खत्म हो जाते हैं। ये पर्व देव दिवाली से एक दिन पहले आता है।
वैकुंठ चतुर्दशी की तिथि
==================
बैकुंठ चतुर्दशी 25 नवंबर 2023 को मनाई जाएगी। ये दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान शिव के भक्तों के लिए भी पवित्र माना जाता है, दरअसल दोनों देवताओं की पूजा एक ही दिन की जाती है। वाराणसी के अलावा, बैकुंठ चतुर्दशी ऋषिकेश, गया और महाराष्ट्र के कई शहरों में भी मनाई जाती है।
वैकुंठ चतुर्दशी का मुहूर्त
=================
कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि 25 नवंबर 2023 को शाम 05 बजकर 22 मिनट से शुरू होगी। अगले दिन 26 नवंबर 2023 को दोपहर 03 बजकर 53 मिनट पर चतुर्दशी तिथि का समापन होगा। शास्त्रों के अनुसार बैकुंठ चतुर्दशी पर विष्णु जी की पूजा निशिता काल में की जाती है।
वैकुण्ठ चतुर्दशी निशिताकाल – 25 नवंबर 2023, रात 11.41 – 26 नवंबर 2023, प्रात: 12.35
अवधि – 54 मिनट
वैकुंठ चतुर्दशी पर बेलपत्र-तुलसी की ये परंपरा निभाई जाती है
==============================
आमतौर पर ऐसा बहुत कम होता है कि एक ही दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु की एक साथ पूजा का शुभ अवसर प्राप्त हो सके लेकिन सालभर में मात्र सिर्फ एक दिन वैकुंठ चतुर्दशी पर हरि-हर दोनों की साथ पूजा होती है। इस दिन विष्णु जी भगवान शिव को तुलसी पत्तियां प्रदान करते हैं और भगवान शिव बदले में भगवान विष्णु को बेलपत्र देते हैं।
वैकुंठ चतुर्दशी का महत्व
==================
शिव पुराण के अनुसार बैकुंठ चतुर्दशी के दिन ही भगवान शिव ने भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र दिया था। इस दिन शिव और विष्णु दोनों ही एकाएक रूप में रहते हैं। जो लोग इस दिन एक हजार कमल के फूलों से विष्णु जी की पूजा करते हैं उन्हें स्वर्ग में स्थान मिलता है।
वैकुंठ चतुर्दशी व्रत की कथा
====================
वहाँ धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण रहता था; वह जीवन भर पापी रहा। फिर, इसके महत्व को जाने बिना, उन्होंने वैकुंठ चतुर्दशी के दिन पवित्र गोदावरी नदी में स्नान किया। इसके अतिरिक्त, वह नदी के किनारे कई अच्छे भक्तों से मिले। उनके निधन के कुछ दिनों बाद, भगवान विष्णु ने भगवान यम के दूतों को धनेश्वर को नरक (नरक) ले जाने से रोकने के लिए हस्तक्षेप किया और इसके बजाय उन्हें वैकुंठ में एक स्थान दिया। उन्होंने बताया कि वैकुंठ चतुर्दशी के दिन जब धनेश्वर ने गोदावरी के पवित्र जल में स्नान किया और अनजाने में अनुयायियों को छू लिया, तो उसके पाप नष्ट हो गए। इसलिए बिना जाने-बूझे उपरोक्त दिन व्रत करने से धनेश्वर को लाभ हुआ।
राजेन्द्र गुप्ता,
ज्योतिषी और हस्तरेखाविद
मो. 9116089175
नोट- अगर आप अपना भविष्य जानना चाहते हैं तो ऊपर दिए गए मोबाइल नंबर पर कॉल करके या व्हाट्स एप पर मैसेज भेजकर पहले शर्तें जान लेवें, इसी के बाद अपनी बर्थ डिटेल और हैंडप्रिंट्स भेजें।

Leave A Comment

All fields marked with an asterisk (*) are required