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राधा रानी की भक्ति की परीक्षा: जब श्रीकृष्ण स्वयं ग्वालिन बनकर बरसाने आए

राधा रानी की भक्ति की परीक्षा: जब श्रीकृष्ण स्वयं ग्वालिन बनकर बरसाने आए

प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाती यह कथा भक्तों के हृदय को छू जाती है।

एक दिन श्रीकृष्ण के मन में विचार आया कि वे राधा रानी की भक्ति की परीक्षा लें। उन्होंने एक ग्वालिन का वेश धारण किया और बरसाने की ओर चल पड़े, जहाँ राधा रानी निवास करती थीं।

जब राधारानी ने उस रूपवती ग्वालिन को देखा, तो उनके मुख पर हर्ष और श्रद्धा की अद्भुत छवि झलकने लगी। वे बोलीं—
“बहन! तुम्हारा रूप देखकर तो सूर्य और चंद्रमा भी लज्जित हो जाएं। तुम्हारे भीतर मुझे मेरे श्याम सुंदर की छवि दिखाई दे रही है। तुम अवश्य वृंदावन से आई कोई बहन या सखी हो।”

वेशधारी श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले—
“हां, मैं राधा से मिलने की ही चाह में यहाँ खिंची चली आई हूँ। तुम्हारे दर्शन से मन को अपार शांति मिली है, पर अब मन थोड़ा उदास है।”

राधा बोलीं— “क्यों सखी? उदासी का क्या कारण है?”

ग्वालिन ने कहा—
“एक दिन मैं दही बेच रही थी कि ब्रज के कृष्ण ने मेरी मटकी फोड़ दी। न माफी मांगी, न कोई पश्चाताप। ऊपर से अपने मित्रों के साथ मेरा उपहास किया। वो तो काले रंग का है, ग्वाला है और अभिमानी भी। मैं नहीं समझती कि तुम क्यों उसकी इतनी प्रशंसा करती हो?”

राधारानी की आँखों में भक्ति का प्रकाश चमक उठा। वे बोलीं—
“सखी! तुम उनका अपमान करती हो, जिन्हें देवता भी पाने को तरसते हैं। धन्य हो तुम, जिनकी मटकी उन्होंने फोड़ी! उन्होंने तुम्हें दर्शन दिए, ये तो सौभाग्य है। उनका श्याम रंग मेरी आत्मा को भाता है, वो मेरे प्राण हैं, मेरे आराध्य हैं। उनका प्रत्येक कार्य लीला है।”

राधा के भाव-पूर्ण शब्द सुनकर श्रीकृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गए। वे बोले—
“राधे!”

अपने प्रिय श्याम को सामने देखकर राधारानी भावविभोर हो गईं और उन्हें हृदय से लगा लिया।

यह प्रसंग केवल एक कथा नहीं, बल्कि प्रेम और भक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक है। जहाँ परीक्षा भी प्रेम से पार हो जाती है और समर्पण ही सर्वोच्च बन जाता है।

जय जय श्री राधे!

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