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तेरी एक मुस्कान के लिए…

तेरी एक मुस्कान के लिए…

आज की यह कहानी मां-बेटे के रिश्ते, गरीबी, संघर्ष, और समाज के डर तथा बहकावे के खिलाफ प्रेम, सेवा, त्याग और आत्मबलिदान का मार्मिक उदाहरण बनती है। इसमें कल्पना और सच्ची पीड़ा का संगम है —

“नमस्कार,
आज मैं आपको ऐसी सच्ची कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जिसमें मां की मजबूरी, बेटे की मासूमियत और समाज के डर का त्रिकोण आपको भीतर तक झकझोर देगा।
कई बार, वास्तविक जीवन की पीड़ा किसी फिल्मी कहानी से भी ज्यादा मारक होती है…

तेरी एक मुस्कान के लिए…
एक छोटा सा गांव— नवादा।

मां रीना, अकेले छोटे बेटे ऋतुन्जय के साथ समस्तीपुर के दहसील सराई के एक किराये के मकान में रहती थी।
पति और बड़े बेटे को छोड़ कर रह रही थी। जिस समय वह नवादा में रहती थी उस समय पति और बच्चों के साथ सभी लोग मेहनत करके बहुत ही खुश थे । मानो वह घर उसके लिए स्वर्ग के जैसा था परंतु एक पाठक के चक्कर में पड़कर के इसने अपने पति और बड़े बेटे को छोड़ दिया था ।

कई रातें भूखी रही, मगर बेटे के पेट में एक दाना कम न पड़े — उसकी सबसे बड़ी चाहत थी। “दोनों बच्चे मृत्युंजय और ऋतुन्जय पढ़ने में होनहार, मां की आंखों का तारा था।

अचानक मृत्युंजय को तेज बुखार, पीलिया, उल्टी-दस्त — हालत बिगड़ती गई।

मृत्युंजय के पिता एक नामी डॉक्टर थे। उन्होंने अपने अस्पताल की चारपाई पर लेटे मृत्युंजय के कई ब्लड टेस्ट किए —
रिजल्ट आया — SGPT, SGOT कई गुना बढ़ा; बिलीरुबिन आसमान छूने लगा।

मृत्युंजय बेटे ने जब रिपोर्ट देखा तो वह अंदर से टूट गया और धीरे से अपने पिताजी से बोल– पापा… मैं ठीक हो जाऊंगा ना….??? उसकी आवाज में आशंका थी, एक डर था परंतु अपने पिता पर पूरा विश्वास थामां था । बेटे की इस वाक्य में पिता के दिल को हला करके रख दिया । वह अंदर ही अंदर टूट रहे थे परंतु एक डॉक्टर होने के नाते अपने आप को उन्होंने तुरंत काबू किया और चेहरे पर एक मीठी मुस्कान लिए हुए बेटे से कहा की — ‘कुछ भी नहीं होगा, बेटा।'”मेरे होते हुए भला तुम्हें कुछ हो जाए…. ऐसा तो हो ही नहीं सकता है। बेटे ने अपने पिता से एक उम्मीद भरी आवाज में कहा- पापा मैं मम्मी को बुला लूं क्या? पापा जो उसे समझाया कि –बेटा जो व्यक्ति आज तक कॉल तक ना किया हो बेटे को,वह भला क्यों आएगा ? तुम चिंता बेकार करते हो। परंतु बेटे के दिल में अभी भी कहीं ना कहीं मां की ममता की एक आशा जाग रही थी। उसने मां को फोन करके कहा –मां…. ओ मेरी प्यारी मां…… आज हमारी तबीयत काफी बिगड़ चुकी है। लगता है अब मैं नहीं बेचूंगा मां….. रिपोर्ट भी मेरा काफी गंदा आया है मां….काफी कमजोरी महसूस हो रही है मां…. मृत्युंजय बेटे ने रोते हुए पुनः कहा – मां… इतनी कमजोरी कभी आज तक महसूस नहीं हुई थी। कुछ भी खाता हूं तो उल्टी हो जाती है, लिवर लगता है पूरी तरह से खराब हो चुका है मां…पापा ने लिवर टेस्ट करवाया जिसमें जौंडिस 15 गुना बढ़ा हुआ है मां… एसजीपीटी और एसजीओटी 3 हजार गुणा बढ़ गया है मां….। रोते हुए बेटे की यह सब बातों का मन पर कोई विशेष असर नहीं पड़ा और मां बोली —तो क्या मुझे आना पड़ेगा?

मृत्युंजय बेटे के दिल में जो मां के लिए अंतिम ममता जग रही थी वह भी अब तार तार होने लगा और टूटी एवं लड़खड़ाते हुए स्वर में बेटे ने अंतिम शब्द कहे — जैसा तुम उचित समझो मां….. तुम एक अध्यापिका हो ,समाज का भार तुम्हारे कंधों पर है मां….. समाज को किस तरह से चलाया जाता है तुम अच्छी तरह से समझती हो मां। फैसला तो अब तुम्हारे हाथ में है ना…. अगर आना उचित समझो तो आ जाओ।

मृत्युंजय की मां के दिल पर भी थोड़ा सा बेटे की बातों का एक चोट सा अनुभव हुआ और वह बेटे से मुलाकात करने के लिए अपने छोटे बेटे ऋतुंजय के साथ आने का मन बना लिया —

पड़ोसी, रिश्तेदार, गांववाले — सब से कुछ सलाह लेने लगी। जब सभी लोग सलाह दे रहे थे तो पाठक पीछे भला क्यों रहता? उसने भी एक सुझाव दिया कि अगर बेटे को तुम अपने पास लेकर के आती हो तो हम दोनों का सच सबके सामने आ जाएगा… सारा पोल खुल जाएगा, और हम दोनों का असली चेहरा समाज के सामने नंगा हो जाएगा।
लोग न जाने क्या-क्या बोलेंगे…

मां फटी आंखों से सबकी बातें सुनती हुए आखिरकार बेटे के पास आ ही गई।

उसने बेटे की आंखों में झांककर देखा —
बेटे के दिल में एक नया जोश पैदा हो गया था ।मां की ममता एक बार पुनः जाग गई और वह बोल पड़ा-‘मां, क्या मुझे अपने पास नहीं रखोगी?’ मां…. मां …..मुझे काफी कमजोरी लग रही है मां…. अब तुम आ गई हो तो यह पापा की दवा बहुत जल्द काम करेगी परंतु तुम्हारी ममता की छांव में अगर यह दवा हम खाएंगे न मां… तो अवश्य ठीक हो जाउंगा। मैं कुछ दिन तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं मां….. मैं तुम्हारे साथ चलना चाहता हूं मां ….बेटों की आवाजों में लड़खड़ाहट और आंखों से झर झर आंसू बह रहे थे।

पर समाज का डर… मां की ममता को बांधता चला गया।
“मां…
तू ही मेरा आसरा है…
मैं बहुत कमजोर पड़ गया हूं…
क्या तू मुझे अपने पास रख सकती है, बस कुछ दिनों के लिए?
मां ने कांपती आवाज़ में कहा —

‘बेटा, हालात मेरे हाथ में नहीं है… लोग क्या कहेंगे, अब कैसे ले जाऊँ तुम्हें? हमारा तो इलेक्शन ड्यूटी लगा है । स्कूल भी जाना पड़ता है ।हम तुम्हें साथ नहीं लेकर जा पाएंगे। बेटा तुम पापा के साथ ही नवादा लौट जाओ। वहां ठीक हो जाओगे । अपने पापा की दवा पर विश्वास रखो, वह एक नामी डॉक्टर है और भला अपने बेटे का इलाज नहीं कर पाएंगे ?तुम अवश्य ठीक हो जाओगे ।मैं तुम्हें साथ नहीं ले जा सकती।

मृत्युंजय बेटे की आंखों में बुझती रोशनी, मां की आत्मा में फूटता अपराधबोध।
मां सोचती है —
‘क्या जिन्दगी में बस समाज, डर और तानों के लिए ही जिया जाए?'”
बेटे की अंतिम इच्छा | बेटा मृत्युंजय अपने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए थोड़ा मुस्कुराकर बोला —
‘मां, तू बस एक बार मेरा माथा चूम ले, मैं तो तुम्हारा एक छोटा सा पुत्र हूं ना परंतु तुम्हारे कंधों पर तो पूरे समाज का बोझ है। तुम अच्छी तरह से समझती हो कि समाज को कैसे चलाना पड़ता है। परंतु मां…….समाज को गलत दिशा मत देना मां…. समाज तुम्हारे आचरण को देखकर सीखेगा ।

मां अगर आज मेरा समय पूरा हो जाए ना तो मेरी चिट्ठी तकिए के नीचे रखा रहेगा —
उसमें सिर्फ यही लिखा होगा — ‘मां तेरी एक मुस्कान के लिए मैं सब दर्द सहूंगा मगर तुम्हें गलत रास्ते पर ले जाने से जरूर रोक दूंगा मां….. तुम एक बार हमें साथ ले जाकर तो देखती। मैं सारे रिश्ते नाते और उस पाठक से भी बदला ले लेता मां…तुम्हारे लिए ,परंतु तुमने मेरा साथ नहीं दिया।

उस समय पछतावे की आग में फूट-फूटकर रोती रहोगी, पर इस बेटे को साथ न ले जा पाऊगी।”

मृत्युंजय बेटे की आंखों में आंसू की धारा न जाने कहां से समुद्र के जैसे बह रहे थे और आवाज एकदम लड़खड़ाते हुए निकल रही थी —

मां…. एक दिन पछताओगी, रोओगी, विलाप करोगी —
‘हे राम! मुझे डर ने मजबूर कर दिया, ममता को नकार दिया…’
समाज, डर, बहकावे का जहर — एक मां को उसकी सच्ची ममता से दूर कर गया।
पर अब पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचेगा मेरी मां।

कभी न भूलने वाला अपराधबोध, जो एक समय मां… तुम्हारे कंधों पर बोझ बन जायेगा।

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