♨️ आज का प्रेरक प्रसंग – तीन मूर्तियाँ ♨️
♨️ आज का प्रेरक प्रसंग – तीन मूर्तियाँ ♨️
तीन मूर्तियाँ – न्याय और परहित की अद्भुत सीख
एक राजा था जिसे शिल्पकला और मूर्तियाँ अत्यंत प्रिय थीं। उसके राजमहल में अनेक दुर्लभ मूर्तियाँ सजाई हुई थीं, पर उनमें से तीन मूर्तियाँ उसे सबसे ज्यादा प्रिय थीं।
मूर्ति टूटना और सेवक को दंड
एक दिन एक सेवक मूर्तियों की सफाई कर रहा था। गलती से उसके हाथों से एक मूर्ति टूट गई। इसे सुनते ही राजा क्रोधित हो गया और उसने सेवक को तत्काल मृत्युदंड दे दिया।
सजा सुनते ही सेवक ने आश्चर्यजनक कार्य किया—उसने बाकी दो मूर्तियाँ भी तोड़ दीं।
सब स्तब्ध रह गए। राजा ने कारण पूछा तो सेवक ने शांत आवाज में कहा—
“महाराज, ये मूर्तियाँ मिट्टी की हैं और कभी भी टूट सकती थीं। अगर भविष्य में किसी और से टूटती, तो उसे भी अकारण मृत्युदंड मिलता। मेरी सजा तो तय है, इसलिए मैंने दो और लोगों की जान बचा ली।”
राजा की आँखें खुलीं
सेवक की बात सुनकर राजा को अपनी भूल का एहसास हुआ। वह समझ गया कि—
न्याय की कुर्सी पर बैठकर भावनाओं के आधार पर निर्णय लेना न्याय का अपमान है।
राजा ने तुरंत सेवक को सजा से मुक्त कर दिया।
सेवक की दूरदृष्टि और संयम का रहस्य
राजा ने उससे पूछा कि इतनी बड़ी विपत्ति सामने होते हुए भी उसने संयम, निडरता और परहित कैसे दिखाया?
सेवक ने बताया कि पहले वह एक अमीर सेठ के यहाँ काम करता था।
एक दिन सेठ कड़वी ककड़ी खा रहा था और नाराज़ होकर वह ककड़ी सेवक को दे दी।
सेवक ने उसे आनंद से खा लिया।
सेठ ने पूछा—
“इतनी कड़वी ककड़ी कैसे खा ली?”
सेवक ने उत्तर दिया—
“सेठ जी, आप रोज स्वादिष्ट चीजें देते हैं। यदि एक दिन कुछ कड़वा भी मिला तो उसे स्वीकार करने में क्या बुराई है?”
फिर सेवक बोला—
“राजा जी, जब ईश्वर ने हमें अनेकों सुख-सुविधाएँ दी हैं, तो कभी कोई कड़वा अनुभव आए तो उसकी मंशा पर संदेह नहीं करना चाहिए। जीवन, सांसें और मृत्यु—सब उसी की देन है।”
कहानी की शिक्षा
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न्याय करते समय भावनाओं को नहीं, सत्य और विवेक को महत्व दें।
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जो मिला है, वही पर्याप्त है—ईश्वर की प्रत्येक देन का सम्मान करें।
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सुख-दुःख को प्रसाद समझकर स्वीकार करें।
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परहित, संयम और दूरदृष्टि मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।
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जो प्रसन्न रहता है, उसके लिए जीवन स्वयं एक उत्सव बन जाता है।
सदैव प्रसन्न रहिये – जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है, उसके पास समस्त है।
