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आदमी और लालटेन

 आदमी और लालटेन

कई बार हम किसी व्यक्ति की कमजोरी देखकर
उसे तुच्छ समझ लेते हैं।
बिना जाने, बिना समझे
व्यंग्य कर बैठते हैं।
पर सत्य अक्सर हमारी धारणाओं से कहीं गहरा होता है।

यह कहानी उसी सत्य का दर्पण है।


एक छोटे से गाँव में एक अंधा आदमी रहता था।
दिन में वह अपने काम स्वयं कर लेता,
लेकिन रात होने पर जब भी बाहर निकलता,
वह हमेशा एक जली हुई लालटेन साथ रखता।

गाँव के लोग उसे देखकर हैरान होते।
वे आपस में कहते—
“अंधा आदमी और लालटेन?
भला इससे इसे क्या फ़ायदा?”

वह बिना कुछ कहे,
शांत भाव से अपना मार्ग तय करता रहता।


एक रात वह अपने मित्र के घर भोजन करके लौट रहा था।
रास्ते में कुछ शरारती लड़के मिले।
लालटेन देखते ही ठहाके गूँज उठे—

“अरे देखो!
अंधा आदमी लालटेन लेकर जा रहा है!
जिसे दिखता ही नहीं,
उसे रोशनी का क्या काम?”

उनकी हँसी सुनकर आसपास खड़े कुछ लोग भी मुस्कुरा उठे।


अंधा आदमी रुक गया।
न उसके चेहरे पर क्रोध था,
न तिरस्कार।

हल्की मुस्कान के साथ उसने कहा—

“आप सही कहते हैं।
मैं अंधा हूँ…
मुझे कुछ दिखाई नहीं देता।

लेकिन यह लालटेन
मेरे लिए नहीं है।

यह आप जैसे देखने वालों के लिए है—
ताकि आप मुझे अँधेरे में देख सकें
और मुझसे टकराकर
खुद को या मुझे चोट न पहुँचा बैठें।

जब आप मुझे देख पाते हैं,
तब मेरा जीवन सुरक्षित रहता है।”


उसके शब्दों ने
हँसी को मौन में बदल दिया।

लड़कों की आँखें झुक गईं।
आसपास खड़े लोग शर्मिंदा हो गए।
सबने उससे क्षमा माँगी
और मन ही मन यह वचन लिया
कि अब वे किसी की कमजोरी पर
बिना समझे उपहास नहीं करेंगे।


उस रात
अंधेरा सिर्फ रास्ते से नहीं,
मन से भी हट गया।

हँसी के पीछे छिपी असमझदारी
उजाले में आ गई।


✨ सीख ✨

कभी भी किसी की कमजोरी पर हँसने से पहले
उसके व्यवहार को समझने की कोशिश करें।
हर कर्म के पीछे कोई कारण होता है।

सही निर्णय हँसी से नहीं,
तर्क और सहानुभूति से होते हैं।
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