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ममता और मोह भाग 6

ममता और मोह — भाग 6

लेखक: डॉ. वेद प्रकाश
मो.: 8709871868


ममता, धैर्य और एक बेटे की टूटती उम्मीद

पिछले भाग में आपने पढ़ा था कि सभा में कुछ क्षणों के लिए ऐसी खामोशी छा गई थी, मानो समय भी ठहर गया हो।

वेद प्रकाश के शब्द हवा में तैर रहे थे—

“धैर्य से बड़ा कोई हथियार नहीं होता बेटा…”

उनकी आवाज़ में न क्रोध था, न शिकायत…
सिर्फ एक पिता का टूटा हुआ लेकिन फिर भी उजला दिल।

मृत्युंजय अपने पिता को देख रहा था।
उसकी आँखें भर आई थीं।

उसे याद आने लगे वे दिन—
जब उसके पिता ने उसकी माँ (रीना कुमारी उर्फ वंदना आर्या) के लिए सब कुछ दाँव पर लगा दिया था।

उन्होंने उसे पढ़ाया…
एम.ए. तक पढ़ाया।

अपनी जमीन-जायदाद
बिना सोचे-समझे
उसके नाम कर दी।

और बदले में
उन्होंने कभी कुछ नहीं माँगा…

सिर्फ एक ही इच्छा थी—
घर में प्रेम बना रहे।

लेकिन जीवन हमेशा मनुष्य की इच्छा के अनुसार नहीं चलता।

सभा समाप्त हो गई।
लोग धीरे-धीरे उठकर जाने लगे।


मृत्युंजय के मन का तूफान

लेकिन मृत्युंजय के मन में एक तूफान उठ रहा था।

उसके भीतर दो आवाज़ें लड़ रही थीं—

एक कहती थी—
“सब खत्म हो चुका है।”

दूसरी कहती थी—
“नहीं… अभी भी उम्मीद बाकी है।”

क्योंकि उसके दिल में अभी भी
माँ की ममता का मोह जीवित था।

वह अपनी माँ से नाराज़ नहीं था।
उसे लगता था—

“माँ गलत नहीं हो सकती…”

उसे लगता था कि कोई और उन्हें भड़का रहा है।

और वह कोई दूर का व्यक्ति नहीं था—
बल्कि नाना-नानी और उनके आसपास के लोग।

यह सोचकर उसका दिल बार-बार काँप उठता।

कई रातें वह सो नहीं पाया।

आखिर एक दिन उसने अपने आप से कहा—

“क्यों न एक बार मैं खुद जाकर नाना-नानी से बात करूँ…?”
“शायद गलतफहमियाँ खत्म हो जाएँ…”
“शायद माँ वापस आ जाए…”

उसके मन में अभी भी अपने नाना-नानी के लिए सम्मान था।

और यही सम्मान उसे फिर से खड़ा कर गया।


8 मार्च 2026 – एक उम्मीद भरी सुबह

8 मार्च 2026 की सुबह थी।

घड़ी में 10 बजकर 10 मिनट हो रहे थे।

उसके पिता किसी काम से बाहर गए हुए थे।
घर में अजीब-सी खामोशी थी।

मृत्युंजय ने धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाए।

दिल जोर-जोर से धड़क रहा था,
लेकिन मन में उम्मीद थी।

रास्ते धीरे-धीरे कटते जा रहे थे।

हर मोड़ पर उसे बचपन की यादें दिखतीं—
जब वह उसी रास्ते से मुस्कुराते हुए
नाना-नानी के घर जाया करता था।

लेकिन आज…

आज वही रास्ता
उसे किसी अनजानी परीक्षा की ओर ले जा रहा था।


हसुआ की जमीन पर पहला कदम

कुछ देर बाद वह हसुआ पहुँच गया।

टेंपो धीरे-धीरे रुक गया।

जैसे ही उसकी नजर पुल के पास बने एचडीएफसी बैंक पर पड़ी, उसका दिल अचानक खुश हो उठा।

“बस… अब नाना से मिलना है…”

उसने टेंपो से नीचे कदम रखा।

लेकिन जैसे ही उसका पैर हसुआ की जमीन पर पड़ा, उसे लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे रोक रही हो।

जैसे कोई कान में फुसफुसा रहा हो—

“मृत्युंजय… वहाँ मत जाओ… खतरा है…”

क्षण भर के लिए वह ठिठक गया।

लेकिन तभी उसे माँ की ममता याद आ गई।

उसने खुद से कहा—

“नहीं… मैं गलत नहीं सोच सकता।”

और उसने अपने कदम आगे बढ़ा दिए।


आशीर्वाद की जगह क्रोध

एचडीएफसी बैंक के पास पहुँचते ही उसने देखा—
नीचे कुर्सी पर उसके नाना बैठे थे।

मृत्युंजय आगे बढ़ा।

सिर झुकाकर
आदर से चरण स्पर्श करते हुए बोला—

“नमस्ते नाना जी…”

लेकिन जहाँ आशीर्वाद मिलना चाहिए था, वहाँ अचानक बिजली गिर गई।

नाना की आँखों में अजीब-सा क्रोध था।

उन्होंने तेज आवाज में कहा—

“यहाँ क्या करने आए हो?”
“किसलिए आए हो यहाँ?”

उनकी आवाज ज्वालामुखी की तरह फट रही थी।

मृत्युंजय स्तब्ध रह गया।

फिर भी उसने खुद को संभालते हुए कहा—

“नाना जी… आप हमसे बड़े हैं…
हम तो सिर्फ आपका आशीर्वाद लेने आए हैं।”

लेकिन क्रोध का तूफान रुकने वाला नहीं था।

नाना बोले—

“मोबाइल लेकर आए हो?”
“रिकॉर्डिंग तो नहीं कर रहे?”

मृत्युंजय घबरा गया।

“नहीं नाना जी… मोबाइल है, लेकिन रिकॉर्डिंग नहीं कर रहा…”

बस इतना कहना था।

नाना ने इशारा किया।


हमला

दो लोग अचानक उसकी ओर बढ़े।

उनमें से एक एचडीएफसी बैंक का गेटमैन था, जिसके हाथ में मजबूत बांस की पट्टी थी।

अचानक दोनों उस पर टूट पड़े।

सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि उसे समझने का मौका भी नहीं मिला।

उन्होंने उसे जमीन पर पटक दिया।

धूल चारों तरफ उड़ गई।

और तभी…

जो हुआ
उसने मानवता को भी शर्मिंदा कर दिया।

नाना आगे बढ़े।

उन्होंने अपने ही नाती की छाती और गले के बीच अपना पैर रख दिया।

और गरजते हुए बोले—

“मोबाइल दो…
नहीं तो अंजाम बहुत बुरा होगा।”

उस क्षण मृत्युंजय की आँखों में आँसू आ गए।

जिस घर को वह बचपन का मंदिर समझता था…

वहीं
आज उसकी इज्जत और उसका विश्वास
दोनों कुचल दिए गए।

मोबाइल छीन लिया गया।

उसके साथ मारपीट हुई।

और किसी तरह अपनी जान बचाकर वह वहाँ से भाग निकला।


एक अजनबी घर का पानी

भागते-भागते वह थक चुका था।

उसे तेज प्यास लगी।

उसने एक घर का दरवाजा खटखटाया।

एक मुस्लिम महिला बाहर आई।

उन्होंने पूछा—

“क्या बात है बेटा?”

मृत्युंजय बोला—

“आंटी… एक गिलास पानी मिलेगा? बहुत प्यास लगी है।”

महिला पानी ले आईं।

उसने दो-तीन घूँट पानी पिया
और तुरंत वहाँ से निकल गया।


एक अनजान दुकानदार की मदद

कुछ दूर जाकर वह एक छोटी दुकान के सामने रुक गया।

दुकानदार ने पूछा—

“क्या हुआ बेटा?”

मृत्युंजय बोला—

“भैया… क्या मैं आपके मोबाइल से एक फोन कर सकता हूँ?”

दुकानदार ने बिना पूछे मोबाइल दे दिया।

मृत्युंजय ने नंबर मिलाया।

उधर से पिता की आवाज आई—

“हाँ बेटा…?”

बस…
इतना सुनते ही
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

उसने पूरी घटना बता दी।

कुछ क्षण बाद पिता की आवाज आई—

“कोई बात नहीं बेटा…
गलती इंसान से ही होती है।
मैं तुम्हारे साथ हूँ।
मैं अभी पहुँच रहा हूँ।”

ये शब्द उसके लिए अंधेरे में दीपक बन गए।


पिता का आगमन

करीब डेढ़ घंटे बाद एक गाड़ी दुकान के सामने रुकी।

गाड़ी से उतरे—
डॉ. वेद प्रकाश।

जैसे ही मृत्युंजय ने उन्हें देखा
वह दौड़कर उनसे लिपट गया
और फूट-फूट कर रो पड़ा।

“पिताजी… मुझे उम्मीद नहीं थी…
नाना-नानी हमारे साथ ऐसा करेंगे…”

वेद प्रकाश ने बेटे को गले लगाते हुए कहा—

“कोई बात नहीं बेटा…
मैं हूँ ना।”


थाना और संयम

दोनों हसुआ थाना पहुँचे।

थानेदार ने पूरी बात सुनी और पूछा—

“एफआईआर दर्ज करें?”

लेकिन वेद प्रकाश ने शांत स्वर में कहा—

“नहीं…
मैं यहाँ लड़ाई करने नहीं आया हूँ।
अगर बात समझदारी से सुलझ जाए
तो वही बेहतर है।”

थानेदार उनकी बात से प्रभावित हुए।

उन्होंने नाना को फोन किया और कहा—

“मोबाइल बच्चे को दे दीजिए।”


दूसरी मुलाकात

पिता-पुत्र फिर एचडीएफसी बैंक पहुँचे।

इस बार वहाँ 10-15 लोग बैठे थे,
दो-तीन लाठियाँ भी रखी थीं।

मृत्युंजय बोला—

“नाना जी… मोबाइल दे दीजिए।”

जवाब आया—

“पहले रिकॉर्डिंग दिखाओ।”

मोबाइल चेक किया गया।

कोई रिकॉर्डिंग नहीं मिली।

तब वेद प्रकाश ने कहा—

“अगर संतोष नहीं है तो मोबाइल फैक्ट्री रिसेट कर दीजिए।”

मोबाइल रिसेट कर दिया गया।

लेकिन गालियाँ जारी रहीं।

वेद प्रकाश सब समझ चुके थे—
उन्हें उकसाया जा रहा था।

उन्होंने बेटे का हाथ पकड़ा
और शांतिपूर्वक वहाँ से निकल गए।


धैर्य – सबसे बड़ा हथियार

उस रात एक बात साफ हो गई—

सच्चा साहस लाठी उठाने में नहीं होता।
सच्चा साहस अपमान सहकर भी शांति बनाए रखने में होता है।

उस रात मृत्युंजय ने अपने पिता में
सिर्फ एक पिता नहीं…

एक महान योद्धा देखा।

जिसका हथियार था—

धैर्य।


समाज की अदालत

हसुआ की घटना धीरे-धीरे पूरे समाज में फैल गई।

लोग चर्चा करने लगे।

आखिर समाज के बुजुर्गों ने निर्णय लिया—

29 मार्च को
बिहार कुमार समन्वय समिति, नवादा के पंचायत भवन में
एक बड़ी सभा होगी।

जहाँ दोनों पक्ष उपस्थित होंगे।

जहाँ फैसला
लाठी या क्रोध से नहीं…

न्याय और विवेक से होगा।


एक बेटे की प्रार्थना

जब मृत्युंजय को यह खबर मिली
तो उसने ईश्वर से प्रार्थना की।

और समाज से हाथ जोड़कर कहा—

“29 मार्च को जब सभा होगी
तो यह मत समझिएगा कि यह एक परिवार का मामला है।
यह हमारे पूरे समाज का आईना है।”

“अगर आज समाज सत्य सुनने नहीं आएगा
तो कल सत्य बोलने वाले अकेले रह जाएंगे।”


उम्मीद की तारीख

29 मार्च…

यह सिर्फ एक तारीख नहीं थी।

यह—

एक बेटे की उम्मीद की तारीख थी।

एक माँ के दिल के जागने की तारीख थी।

और समाज की आत्मा की परीक्षा की तारीख थी।

शायद उस दिन…

एक माँ की आँखों से पछतावे के आँसू बहें।

और एक बेटा फिर से कह सके—

“माँ…
मैं आज भी
आपसे नाराज़ नहीं हूँ…”

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