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केवट जयंती आज

केवट जयंती आज
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भक्त केवट वही है जिन्होंने त्रेतायुग में भगवान राम की नदी पार कराने में मदद की थी। प्रसन्न होकर भगवान राम एवं माता सीता ने आशीर्वाद प्रदान किया था। भारत के निषाद समाज, केवट समाज इस दिन को हर राज्य में अलग अलग तरह से वहां की परंपरा के हिसाब से मनाया जाता है।
कौन थे केवट?
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गुहराज निषादजी ने अपनी नाव में प्रभु श्रीराम को गंगा के उस पार उतारा था। वे केवट थे अर्थात नाव खेने वाले। निषादराज गुह मछुआरों और नाविकों के मुखिया थे। श्रीराम को जब वनवास हुआ तो वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था।
क्या करते हैं इस दिन?
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• यह जयंती बड़े ही धूप धाम से मनाई जाती है।
• इस दिन चल समारोह भी निकाला जाता है।
• इस दिन केवट समाज श्रीराम के साथ ही गुहराज निषादजी की पूजा करता है।
निषादराज केवट का वर्णन रामायण के अयोध्याकाण्ड में किया गया है।
मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥
चरन कमल रज कहुं सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥
श्रीराम ने केवट से नाव मांगी, पर वह लाता नहीं है। वह कहने लगा- मैंने तुम्हारा मर्म जान लिया। तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है। वह कहता है कि पहले पांव धुलवाओ, फिर नाव पर चढ़ाऊंगा।
प्रभु श्रीराम ने नाव उतराई के लिए केवटी जो अंगुठी देना चाही परंतु उन्होंने इनकार कर दिया और चरण पकड़कर कहा कि जिस तरह मैंने आज आपको इस पार उतारा है आप भी मुझे इस भवसागर के उस पार उतार देना प्रभु।
राजेन्द्र गुप्ता,
ज्योतिषी और हस्तरेखाविद

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