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श्यामा गाय का निष्कपट प्रेम: जब गौमाता के प्रेम में बंध गए श्रीकृष्ण

श्यामा गाय का निष्कपट प्रेम

वृंदावन की पावन भूमि में नंदबाबा के गोशाले में अनेक सुंदर गायें थीं।
कोई श्वेत थी, कोई कपिला, कोई चितकबरी।

परंतु उन सबमें एक गाय ऐसी थी जो श्रीकृष्ण को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थी — उसका नाम था श्यामा

उसका रंग घने वर्षा-मेघों के समान गहरा श्याम था।
उसकी बड़ी-बड़ी करुण आँखें सदैव अपने प्रिय कान्हा को निहारती रहती थीं।

जब भी श्रीकृष्ण अपनी मधुर बाँसुरी बजाते, श्यामा सबसे पहले दौड़ी चली आती।
कृष्ण जहाँ जाते, श्यामा उनके पीछे-पीछे चल पड़ती।

गोपबालक हँसते हुए कहते—

“कन्हैया, यह गाय नहीं… तुम्हारी छाया है।”

प्रभु मुस्कुराकर उसके मस्तक पर हाथ फेरते और कहते—

“श्यामा केवल गाय नहीं, यह तो मेरी माँ समान है।”


कृष्ण के बिना अधूरा हर पल

प्रतिदिन प्रातःकाल जब श्रीकृष्ण गायों को लेकर वन में जाते, श्यामा सबसे आगे चलती।

वह बार-बार पीछे मुड़कर देखती कि कहीं उसका प्रिय कान्हा पीछे तो नहीं रह गया।
यदि कृष्ण किसी वृक्ष के नीचे विश्राम करते, तो श्यामा भी वहीं बैठ जाती।
यदि वे यमुना नदी का जल पीते, तो वह भी उन्हीं के समीप जल ग्रहण करती।

उसके लिए संसार का सबसे बड़ा सुख केवल एक था—
अपने प्रिय कान्हा के समीप रहना।


जब बिछड़ गई श्यामा

एक दिन वसंत ऋतु की मधुर बेला थी।

वृंदावन के वन पुष्पों की सुगंध से महक रहे थे।
यमुना की शीतल लहरें बह रही थीं।

श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ खेलते-खेलते बहुत दूर निकल गए।
कभी वे गेंद खेलते, कभी बाँसुरी बजाते, कभी वृक्षों पर चढ़ जाते।

खेल में सभी इतने मग्न हो गए कि समय का ध्यान ही न रहा।

धीरे-धीरे सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ चला।
आकाश लालिमा से भर गया।
पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौटने लगे।

तब सखाओं ने कहा—

“कन्हैया, अब चलो, बहुत देर हो गई है।”

सभी गायें गोकुल की ओर लौट चलीं।
पर श्यामा वहीं खड़ी रही।

उसकी आँखें चारों ओर केवल कृष्ण को खोज रही थीं।


प्रेम की बेचैनी

श्यामा कभी इस दिशा में दौड़ती, कभी उस दिशा में।

उसे ऐसा लग रहा था मानो यदि वह कृष्ण को छोड़कर चली गई, तो उसका हृदय सदा के लिए सूना हो जाएगा।

उधर यशोदा मैया गोकुल के द्वार पर खड़ी प्रतीक्षा कर रही थीं।

जब सारी गायें लौट आईं, पर श्यामा नहीं आई, तो उन्होंने चिंतित होकर पूछा—

“अरे, श्यामा कहाँ रह गई?”

गोपबालकों ने उत्तर दिया—

“मैया, वह तो कान्हा को खोज रही थी। शायद अभी वन में ही होगी।”


बाँसुरी की पुकार

वन में अंधकार बढ़ने लगा।
शीतल हवा बह रही थी।

पर श्यामा को अपने कष्ट का कोई भान न था।
वह केवल करुण स्वर में पुकार रही थी—

“कान्हा… कान्हा…”

तभी दूर से बाँसुरी की मधुर ध्वनि सुनाई दी।

वह स्वर सुनते ही श्यामा की आँखें चमक उठीं।

वह वेग से उस दिशा में दौड़ी।

वृक्षों के मध्य श्रीकृष्ण खड़े मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।


निष्कपट प्रेम का मिलन

श्यामा उन्हें देखते ही दौड़कर उनके समीप पहुँची और अपना मुख प्रभु के चरणों में रख दिया।

उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।

श्रीकृष्ण ने उसे प्रेमपूर्वक गले लगा लिया और बोले—

“माँ, तुम अभी तक घर क्यों नहीं गई? क्या तुम्हें भय नहीं लगा?”

श्यामा प्रभु के चरण चाटने लगी, मानो कह रही हो—

“प्रभु, आपके बिना मुझे कोई स्थान प्रिय नहीं।”

कृष्ण की आँखें भी प्रेम से भर आईं।

उन्होंने उसके मस्तक को सहलाते हुए कहा—

“जिस हृदय में निष्कपट प्रेम होता है, वहाँ स्वयं मैं निवास करता हूँ।”


देवताओं की पुष्पवृष्टि

उसी क्षण आकाश दिव्य प्रकाश से भर उठा।

देवताओं ने पुष्पवृष्टि की।

नारद मुनि प्रकट हुए और बोले—

“धन्य है यह गौमाता, जिसका प्रेम इतना निर्मल है कि स्वयं परमात्मा भी उसके प्रेम में बंध गए।”


श्रीकृष्ण का दिव्य संदेश

उस दिन श्रीकृष्ण ने अपने सखाओं से कहा—

“जो गौसेवा करता है और गायों से प्रेम करता है, उस पर मेरी विशेष कृपा होती है।
गाय का हृदय अत्यंत पवित्र होता है।
उसमें छल नहीं, केवल प्रेम होता है।”


कथा का संदेश

श्यामा गाय की यह कथा हमें सिखाती है कि—

सच्ची भक्ति में कोई स्वार्थ नहीं होता।
वहाँ केवल समर्पण, प्रेम और निष्कपट भाव होता है।

भगवान को पाने के लिए बड़े यज्ञ, कठिन तप या विशाल ज्ञान की आवश्यकता नहीं।

केवल एक निर्मल हृदय चाहिए।

जैसे श्यामा ने अपने निष्कपट प्रेम से श्रीकृष्ण को पा लिया,
वैसे ही जो भक्त प्रेमपूर्वक प्रभु को पुकारता है, प्रभु अवश्य उसके पास आते हैं।

जिस प्रेम में स्वार्थ न हो, वही सच्ची भक्ति है। 🙏

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