श्री यन्त्र पूजन विधान: श्रीसूक्त पाठ, महालक्ष्मी ध्यान, न्यास और आवरण पूजा की संपूर्ण विधि
श्री यन्त्र पूजन विधान: श्रीसूक्त पाठ, महालक्ष्मी ध्यान, न्यास और आवरण पूजा की संपूर्ण विधि
श्री यन्त्र पूजन विधान माता महालक्ष्मी की उपासना की एक पारंपरिक तांत्रिक पद्धति है। इसमें श्रीसूक्त का विनियोग, ऋष्यादि न्यास, अंगन्यास, षडंग न्यास, देवी का ध्यान, मानस पूजन, आवाहन, षोडशोपचार पूजा, आवरण पूजा तथा महालक्ष्मी के 32 नामों से अर्चना का विधान बताया गया है।
प्रस्तुत पूजन-विधान प्रपञ्चसार तन्त्र, श्रीविद्यार्णव तन्त्र एवं शारदातिलक तन्त्र के आधार पर संकलित संक्षिप्त विवरण है। इस उपासना में मंत्रों के शुद्ध उच्चारण, विधि और परंपरा का विशेष महत्त्व माना गया है।
1. श्रीसूक्त का विनियोग
श्रीसूक्त के मंत्रों का जप आरंभ करने से पहले विनियोग किया जाता है। दिए गए विधान में श्रीसूक्त के ऋषि, छंद, देवता, बीज, शक्ति और कीलक का उल्लेख करते हुए श्रीमहालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के उद्देश्य से जप का संकल्प किया गया है।
विनियोग का भाव यह है कि साधक श्रीमहालक्ष्मी की प्रसन्नता और अनुग्रह की कामना से श्रद्धापूर्वक श्रीसूक्त का पाठ करे।
2. ऋष्यादि न्यास
ऋष्यादि न्यास में श्रीसूक्त के ऋषियों, छंद, देवता, बीज, शक्ति, कीलक तथा विनियोग का शरीर के निर्धारित अंगों से संबंध स्थापित किया जाता है।
इस विधान में—
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ऋषियों का न्यास सिर पर।
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छंदों का न्यास मुख पर।
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देवताओं का न्यास हृदय में।
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बीज का न्यास गुह्य स्थान पर।
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शक्ति का न्यास पैरों में।
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कीलक का न्यास नाभि पर।
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विनियोग का न्यास संपूर्ण शरीर पर किया जाता है।
3. श्रीसूक्त के मंत्रों से अंगन्यास
अंगन्यास में श्रीसूक्त की ऋचाओं का उच्चारण करते हुए शरीर के विभिन्न अंगों में न्यास किया जाता है। दिए गए विधान में पंद्रह ऋचाओं को क्रमशः सिर, नेत्र, कान, नासिका, मुख, कंठ, बाहुओं, हृदय, नाभि, अन्य निर्धारित अंगों और पैरों से संबद्ध किया गया है।
श्रीसूक्त की प्रथम ऋचा इस प्रकार है—
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
इस प्रकार प्रत्येक ऋचा के साथ निर्धारित अंग में न्यास किया जाता है।
4. षडंग न्यास एवं दिग्बंधन
श्रीसूक्त की उपासना में षडंग न्यास के अंतर्गत हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र से संबंधित मंत्रों का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ करन्यास और अंगन्यास भी विधान के अनुसार किए जाते हैं।
इसके बाद—
ॐ भूर्भुवः स्वरोम्।
इस मंत्र से दिग्बंधन किया जाता है।
न्यास और दिग्बंधन का क्रम संबंधित साधना-पद्धति के अनुसार रखा जाना चाहिए।
5. भगवती महालक्ष्मी का ध्यान
पूजन से पहले देवी महालक्ष्मी के दिव्य स्वरूप का ध्यान किया जाता है। दिए गए ध्यान में देवी को कमलासन पर विराजमान, कमल के समान नेत्रों वाली, शुभ्र वस्त्र धारण किए हुए तथा दिव्य आभूषणों से अलंकृत बताया गया है।
ध्यान मंत्र—
या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी,
गम्भीरावर्तनाभिस्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया।
लक्ष्मीर्दिव्यैर्गन्धमणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भैः,
नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता॥
इसके पश्चात् देवी को समस्त लोकों की माता, मंगल प्रदान करने वाली और कमल धारण करने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया जाता है।
6. महालक्ष्मी का मानस पूजन
मानस पूजन में साधक मन ही मन देवी को विभिन्न तत्त्वों से निर्मित पूजा-सामग्री अर्पित करता है। प्रस्तुत विधान में पृथ्वी, आकाश, वायु, अग्नि, जल और समस्त तत्त्वों के प्रतीक रूप में गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल समर्पित करने का वर्णन है।
इसका उद्देश्य बाहरी पूजा के साथ-साथ मन को भी देवी की आराधना में एकाग्र करना है।
7. पीठ पूजन और देवी का आवाहन
मानस पूजन के बाद अर्घ्य, पाद्य और आचमनीय आदि पात्रों की स्थापना करके पीठ पूजन किया जाता है। पूजन यंत्र की स्थापना के पश्चात् देवी महालक्ष्मी की पीठ-शक्तियों का पूजन किया जाता है।
इन शक्तियों में—
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श्री विभूति
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श्री उन्नति
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श्री कान्ति
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श्री सृष्टि
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श्री कीर्ति
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श्री सन्नति
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श्री व्युष्टि
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श्री उत्कृष्टि
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श्री ऋद्धि
का उल्लेख है।
इसके बाद गुरुदेव का पूजन और उनसे आज्ञा लेने का विधान दिया गया है। देवी का ध्यान करके निम्न प्रार्थना के साथ आवाहन किया जाता है—
ॐ देवेशि! भक्ति-सुलभे, परिवार-समन्विते!
तावत् त्वां पूजयिष्यामि, तावत् त्वं स्थिरा भव॥
इसके पश्चात् श्रीसूक्त की ऋचा से देवी का आवाहन तथा संबंधित परंपरा के अनुसार प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है।
8. महालक्ष्मी की उपचार पूजा
देवी के आवाहन के पश्चात् उपलब्ध पूजन सामग्री से उपचार अर्पित किए जाते हैं। मूल विधान में आसन, अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय, मधुपर्क, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल सहित विभिन्न उपचारों का वर्णन है।
प्रमुख उपचार
आसन: देवी को कमलासन अर्पित किया जाता है।
अर्घ्य: श्रद्धापूर्वक अर्घ्य समर्पित कर देवी को प्रणाम किया जाता है।
पाद्य: देवी के चरण-कमलों में पाद्य अर्पित किया जाता है।
आचमनीय: आचमन के लिए जल समर्पित किया जाता है।
मधुपर्क: निर्धारित विधि से मधुपर्क अर्पित करके पुनः आचमन कराया जाता है।
स्नान: परंपरा के अनुसार देवी को स्नान तथा सुगंधित द्रव्यों से संबंधित उपचार समर्पित किए जाते हैं।
वस्त्र एवं आभूषण: देवी को वस्त्र, अलंकार और अन्य उपलब्ध उपचार अर्पित किए जाते हैं।
गंध एवं पुष्प: चंदन, गंध और पुष्प समर्पित करके देवी का पूजन किया जाता है।
धूप एवं दीप: धूप दिखाकर दीप अर्पित किया जाता है।
नैवेद्य: विधि के अनुसार नैवेद्य अर्पित कर देवी से उसे स्वीकार करने की प्रार्थना की जाती है।
ताम्बूल: अंत में ताम्बूल समर्पित करके प्रणाम किया जाता है।
प्रत्येक उपचार के साथ संबंधित मंत्र का पाठ मूल विधान के अनुसार किया जाता है।
9. श्री यन्त्र की आवरण पूजा
आवरण पूजा में भगवती महालक्ष्मी के परिवार, शक्तियों, दिक्पालों और उनके आयुधों का पूजन किया जाता है। प्रस्तुत विधान में चार आवरणों का वर्णन है।
प्रथम आवरण: षडंग शक्तियों का पूजन
प्रथम आवरण में श्री यन्त्र के केसरों में छह शक्तियों का पूजन किया जाता है—
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हिरण्यमयी
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चन्द्रा
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रजतस्रजा
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हिरण्यस्रजा
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हिरण्या
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हिरण्यवर्णा
पूजन के बाद इसका फल भगवती को समर्पित करके पुष्पांजलि दी जाती है।
द्वितीय आवरण: कमल की शक्तियों का पूजन
द्वितीय आवरण में निम्न आठ शक्तियों का पूजन-तर्पण किया जाता है—
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पद्मा
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पद्मवर्णा
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पद्मस्था
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आर्द्रा
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तर्पयन्ती
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तृप्ता
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ज्वलन्ती
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स्वर्णप्राकारा
प्रत्येक शक्ति को नमस्कार करके पूजन और तर्पण किया जाता है। इसके बाद पूजा का फल देवी को समर्पित किया जाता है।
तृतीय आवरण: दिक्पालों का पूजन
तृतीय आवरण में भू-पुर में इन्द्र आदि दिक्पालों का पूजन किया जाता है। इसमें दिशाओं के अनुसार इन्द्र, अग्नि, यम, निऋति, वरुण, वायु, सोम और ईशान का उल्लेख है। साथ ही ब्रह्मा और अनन्त का पूजन भी निर्धारित स्थानों पर किया जाता है।
पूजन के बाद उसका फल भगवती महालक्ष्मी को समर्पित किया जाता है।
चतुर्थ आवरण: आयुधों का पूजन
चतुर्थ आवरण में दिक्पालों के समीप उनके आयुधों का पूजन किया जाता है। इसमें प्रमुख रूप से—
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वज्र
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शक्ति
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दण्ड
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खड्ग
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पाश
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अंकुश
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गदा
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त्रिशूल
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पद्म
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चक्र
का पूजन-तर्पण शामिल है।
आवरण पूजा पूर्ण होने पर पुष्पांजलि अर्पित करके पूजा का फल देवी को समर्पित किया जाता है।
10. महालक्ष्मी के 32 नामों से पूजन
आवरण पूजा के बाद गंध, पुष्प और अक्षत से भगवती महालक्ष्मी के 32 नामों का पूजन-तर्पण किया जाता है। मूल पाठ में दिए गए नाम निम्नलिखित हैं—
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श्री
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लक्ष्मी
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वरदा
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विष्णुपत्नी
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वसुप्रदा
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हिरण्यरूपिणी
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स्वर्णमालिनी
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रजतस्रजा
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स्वर्णगृहा
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स्वर्णप्राकारा
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पद्मवासिनी
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पद्महस्ता
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पद्मप्रिया
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मुक्तालंकारा
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सूर्या
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चन्द्रा
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बिल्वप्रिया
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ईश्वरी
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भुक्ति
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प्रभुक्ति
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विभूति
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ऋद्धि
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समृद्धि
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तुष्टि
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पुष्टि
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धनदा
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धनेश्वरी
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श्रद्धा
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भोगिनी
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भोगदा
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धात्री
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विधात्री
प्रत्येक नाम के साथ संबंधित मंत्र का उच्चारण करके पूजन एवं तर्पण किया जाता है। मूल विधान में इन 32 नामों से हविष्य-बलि प्रदान करने का भी उल्लेख है।
11. श्रीसूक्त पाठ, आरती और पूजा का समापन
पूजन के अंत में श्रीसूक्त की पंद्रह ऋचाओं से नीराजन और प्रदक्षिणा करके पुष्पांजलि अर्पित की जाती है। इसके बाद पुनः न्यास करके श्रीसूक्त का पाठ किया जाता है।
अंतिम चरण में—
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क्षमापन स्तोत्र का पाठ किया जाता है।
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पूजन और जप का फल भगवती को समर्पित किया जाता है।
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परंपरा के अनुसार देवी का विसर्जन किया जाता है।
मूल विधान में श्रीसूक्त के साधकों के लिए पुरश्चरण काल में तथा उसके बाद भी प्रतिदिन सूर्योदय के समय स्नान करके सूर्य-मंडल में स्थित भगवती महालक्ष्मी का 32 नामों से तर्पण करने का उल्लेख है।
12. श्री यन्त्र पूजन में ध्यान रखने योग्य बातें
श्री यन्त्र पूजन का यह विधान सामान्य पूजा की तुलना में अधिक विस्तृत है। इसमें मंत्र-विनियोग, न्यास, मुद्राएँ, प्राण-प्रतिष्ठा और आवरण पूजा जैसे विशिष्ट अनुष्ठान सम्मिलित हैं। इसलिए—
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मंत्रों का पाठ मूल परंपरा और शुद्ध पाठ के अनुसार करें।
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न्यास, मुद्राओं और प्राण-प्रतिष्ठा की विधि गुरु या योग्य आचार्य से समझें।
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अपनी परंपरा में निर्धारित पूजन सामग्री और क्रम का पालन करें।
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यदि पूरी तांत्रिक विधि का ज्ञान न हो, तो स्वयं जटिल अनुष्ठान करने के बजाय योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में पूजा करें।
यह लेख उपलब्ध पूजन-विधान का व्यवस्थित प्रस्तुतीकरण है। इसमें वर्णित धार्मिक मान्यताएँ और अनुष्ठान संबंधित तांत्रिक परंपराओं पर आधारित हैं।
समापन प्रार्थना
माँ पराम्बा भगवती राजराजेश्वरी महालक्ष्मी प्रसन्नोस्तु।
