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अभ्यंग — आयुर्वेदिक जीवनशैली का अमृत

📌 भूमिका

भारतीय आयुर्वेद में अभ्यंग, अर्थात् शरीर की तेल मालिश, केवल एक उपचार पद्धति नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की आधारशिला है। इसे दैनिक दिनचर्या (Dinacharya) का आवश्यक अंग माना गया है, जो शरीर, मन और आत्मा — तीनों को संतुलन में लाता है। नियमित अभ्यंग से न केवल शरीर मजबूत और त्वचा सुंदर बनती है, बल्कि मानसिक शांति, गहरी नींद और दीर्घायु जीवन भी प्राप्त होता है।


🌿 अभ्यंग के 9 अद्भुत लाभ


1️⃣ त्वचा की सुंदरता और पोषण
अभ्यंग मृत कोशिकाएँ हटाकर त्वचा को भीतर से पोषण देता है। यह त्वचा को कोमल, चिकनी और झुर्रियों से मुक्त बनाए रखता है।

2️⃣ रक्तसंचार में सुधार
तेल की मालिश त्वचा के नीचे की नसों को सक्रिय कर रक्त प्रवाह को सुचारू बनाती है, जिससे विषैले तत्व बाहर निकलते हैं।

3️⃣ वात दोष का नियंत्रण
वात दोष के असंतुलन से जोड़ों में दर्द, सूखापन, थकावट होती है। अभ्यंग वात दोष को शांत कर स्नेह बढ़ाता है।

4️⃣ मांसपेशियों और जोड़ों को मज़बूती
मालिश से मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं और जोड़ों में जकड़न या दर्द दूर होता है। गठिया और साइटिका में यह रामबाण है।

5️⃣ मानसिक तनाव में राहत
मालिश के दौरान शरीर में तनाव घटाने वाले हार्मोन संतुलित होते हैं, जिससे चिंता दूर होती है और दिमाग शांत होता है।

6️⃣ बेहतर नींद
सिर, गर्दन और पैरों की अभ्यंग से नर्वस सिस्टम शांत होता है और गहरी नींद आती है — अनिद्रा में यह अत्यंत लाभकारी है।

7️⃣ रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि
अभ्यंग शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाकर संक्रमण से रक्षा करता है।

8️⃣ पाचन तंत्र में सुधार
पेट की हल्की मालिश से कब्ज, गैस और अपच से राहत मिलती है और पाचन अंग सक्रिय होते हैं।

9️⃣ उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करना
नियमित अभ्यंग से त्वचा, मांसपेशियाँ और अंग स्वस्थ रहते हैं — ओज बढ़ता है और दीर्घायु मिलती है।


किस तेल का प्रयोग करें?

  • वात दोष – तिल तेल, अश्वगंधा तेल

  • पित्त दोष – नारियल तेल, चंदन तेल, ब्राह्मी तेल

  • कफ दोष – सरसों तेल, नीम तेल

विशेष औषधीय तेल:
• नारायण तेल — गठिया में
• महा नारायण तेल — वात रोगों में
• बाला तेल — नसों की कमजोरी में
• ब्राह्मी तेल — मानसिक तनाव और सिर के लिए


🔹 अभ्यंग की सही विधि

  • तेल को हल्का गुनगुना करें।

  • शांत स्थान पर बैठकर सिर से शुरू कर पैरों तक मालिश करें।

  • 20–30 मिनट बाद गुनगुने पानी से स्नान करें।

  • साबुन कम इस्तेमाल करें।

सर्वोत्तम समय: सुबह स्नान से पहले। समय न मिले तो शाम को सिर, हाथ, पैरों की मालिश करें। सप्ताह में 3 बार अवश्य करें — प्रतिदिन करें तो उत्तम।


⚠️ कब न करें?

  • बुखार में

  • त्वचा पर घाव, संक्रमण या जलन में

  • अपच या पाचन बिगड़ने पर

  • मासिक धर्म के पहले दो दिन

  • अत्यधिक कमजोरी में


अभ्यंग केवल बाहरी उपचार नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा को संतुलित रखने की भारतीय परंपरा है। आज के तनावपूर्ण जीवन में यह सरल उपाय रोगों से बचाता है और दीर्घायु प्रदान करता है।

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