गंगापुत्र भीष्म पितामह के 16 रहस्य
गंगापुत्र भीष्म पितामह के सोलह अद्भुत रहस्य
महाभारत के सबसे तेजस्वी, पराक्रमी और धर्मनिष्ठ योद्धा भीष्म पितामह को देवता, ऋषि व स्वयं कृष्ण भी आदर देते थे। वे केवल हस्तिनापुर के महान सेनापति ही नहीं, बल्कि नीति-ज्ञान, तप, योग और ब्रह्मचर्य के प्रतीक भी थे। आइए जानें भीष्म पितामह के वे 16 रहस्य, जो उन्हें असाधारण बनाते हैं।
1. देवताओं का युग और गंगा का दिव्य स्वरूप
वह काल ऐसा था जब देवता मनुष्य-लोक में आते-जाते थे। इन्हीं दिव्य शक्तियों में से एक थीं माता गंगा, जिनसे राजा शांतनु का संबंध जुड़ा और आगे चलकर देवव्रत (भीष्म) का जन्म हुआ।
2. गंगा ने शांतनु से विवाह क्यों किया?
राजा प्रतीप ने गंगा को पुत्रवधू बनने का वचन दिया था। प्रतीप के पुत्र शांतनु से गंगा ने विवाह किया और उन्हें आठ पुत्र हुए — जिनमें से सात को गंगा ने शापमोचन हेतु नदी में प्रवाहित कर दिया, और आठवें देवव्रत को शांतनु ने रोक लिया।
3. वशिष्ठ ऋषि का शाप और वसुओं का जन्म
वसु ‘द्यु’ द्वारा कामधेनु हरण करने के कारण वशिष्ठ ने वसुओं को मनुष्ययोनि का शाप दिया। गंगा ने वसुओं की मुक्ति के लिए स्वयं मनुष्य रूप लेकर उन्हें जन्म लेते ही जल में मुक्त किया। लेकिन आठवें वसु ‘द्यु’ को शाप के कारण पूरा जीवन मनुष्य बनकर बिताना पड़ा — यही आगे चलकर भीष्म बने।
4. शांतनु का सत्यवती से प्रेम
यमुना पर नाव चलाती निषाद कन्या सत्यवती को देखकर शांतनु मोहित हो गए, लेकिन उसके पिता ने शर्त रखी कि सत्यवती का पुत्र ही राजा बनेगा। शांतनु शर्त मान नहीं पाए और दुखी रहने लगे।
5. देवव्रत की भीषण प्रतिज्ञा — “भीष्म” नाम की उत्पत्ति
पिता की व्यथा जानकर देवव्रत ने सत्यवती के पुत्र को राजा बनाने की प्रतिज्ञा ली और स्वयं आजीवन ब्रह्मचारी रहने का व्रत लिया। उनकी भयंकर प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर शांतनु ने उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान दिया। तभी से वे भीष्म पितामह कहलाए।
6. सत्यवती के पुत्रों की मृत्यु और गद्दी संकट
सत्यवती के दो पुत्र — चित्रांगद और विचित्रवीर्य — दोनों कम उम्र में मर गए। विचित्रवीर्य की पत्नियों (अंबिका-अंबालिका) से भी कोई संतान न होने पर वंश संकट उत्पन्न हुआ।
7. परशुराम और भीष्म का भयंकर युद्ध
अंबा के अपहरण का दोष भीष्म पर लगाया गया। वह परशुराम के पास गईं और भीष्म पर युद्ध का आदेश हुआ। 21 दिनों तक भीषण युद्ध चला, लेकिन अंत में ऋषियों ने युद्ध रुकवाया। ब्रह्मचर्य-व्रत पर भीष्म दृढ़ रहे।
8. नियोग प्रथा और राज्य का पुनः विस्तार
भीष्म की प्रतिज्ञा न तोड़ पाने पर सत्यवती ने ऋषि वेदव्यास से नियोग द्वारा धृतराष्ट्र और पांडु को उत्पन्न कराया। इससे कौरव-पांडव वंश आगे बढ़ा।
9. कृष्ण-भक्त भीष्म
भीष्म ने कृष्ण को ईश्वर रूप में पहचान लिया था। युद्ध में कृष्ण ने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी, लेकिन भीष्म के प्रेम और आग्रह पर वे रथ का पहिया उठा लेते हैं।
10. युद्ध में भीष्म का अद्वितीय पराक्रम
महाभारत के प्रथम 10 दिनों तक भीष्म ने पांडव पक्ष को भारी क्षति पहुंचाई। नौवें दिन उन्होंने अर्जुन के रथ को लगभग तबाह कर दिया।
11. शिखंडी के सामने अस्त्र-शस्त्र त्याग
भीष्म ने कहा था कि वे “नपुंसक या स्त्री” के सामने शस्त्र नहीं उठाएंगे। इस रहस्य को जानकर पांडवों ने शिखंडी को सामने रखा, और अर्जुन ने बाणों की वर्षा कर दी। भीष्म शरशय्या पर लेट गए।
12. अर्जुन द्वारा बनाया गया बाणों का सिरहाना
जब भीष्म का सिर नीचे लटकने लगा, तब अर्जुन ने तीन तीखे बाण चलाकर उनके ललाट में गाड़ दिए, जो सिर के लिए सिरहाना बने।
13. सूर्य उत्तरायण का इंतजार — इच्छामृत्यु का रहस्य
इच्छामृत्यु के वर के कारण भीष्म तब तक प्राण नहीं त्याग सकते थे जब तक वे स्वयं न चाहें। उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया ताकि आत्मा को सद्गति मिले।
14. जल प्राप्ति और अंतिम उपदेश
अर्जुन ने पर्जन्यास्त्र का प्रयोग कर जमीन से मीठा, शीतल और दिव्य जल प्रवाहित किया जिसे पीकर भीष्म तृप्त हुए। उन्होंने दुर्योधन व कर्ण दोनों को युद्ध त्यागने की सीख दी।
15. राजधर्म, मोक्षधर्म, आपद्धर्म का उपदेश
युद्ध शांत करने, पांडवों की ग्लानि दूर करने और युधिष्ठिर को शासन का ज्ञान देने के लिए भीष्म ने अपने अंतिम 58 दिनों में महाभारत के महान उपदेश दिए।
16. दिव्य वसु का देहत्याग — 150 वर्ष की आयु
भीष्म साधारण मनुष्य नहीं बल्कि आदित्य-वसु थे। योगबल, ब्रह्मचर्य और इच्छामृत्यु ने उन्हें असाधारण आयु प्रदान की।
उत्तरायण के दिन उन्होंने देव-लोक की ओर प्रस्थान किया।
भीष्म पितामह केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि नीति, त्याग, तप, ब्रह्मचर्य और धर्म का सर्वोच्च आदर्श हैं। उनका जीवन मानवता को कर्तव्य, समर्पण और धर्मनिष्ठा का संदेश देता है।
![]()
