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ऊब छठ व्रत आज

ऊब छठ व्रत आज

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भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की छठ (षष्ठी तिथि) को ही ऊब छठ कहा जाता है। ऊब छठ को चन्दन षष्ठी, चानन छठ और चंद्र छठ के नाम से भी जाना जाता है।
वहीं देश के कई राज्यों में इस दिन को हलषष्ठी के रूप में भी मानते है। माना जाता है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम का जन्म हुआ था। और उनका शस्त्र हल था, इसलिए इस दिन को हलषष्ठी भी कहा जाता है। वहीं कई जगह इस दिन को चंदन षष्ठी के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान कृष्ण के बड़े भ्राता बलराम का जन्म दिवस (चंद्र षष्ठी पर्व) 14 अगस्त को ऊब छठ के रूप में मनाया जाएगा।
ऊब छठ पूजा विधि
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महिलाएं और युवतियां पूरे दिन उपवास रख, शाम को दुबारा नहाती है। फिर नए कपड़े पहन कर मंदिर जा वहां भजन करती हैं। इस दिन कुछ लोग अपने इष्ट के साथ-साथ लक्ष्मी जी और और गणेश जी की भी पूजा करते है।
ऊब छठ में चांद का महत्व
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जिसके बाद वह भगवान को कुमकुम और चन्दन से तिलक कर सिक्का ,फल, फूल , सुपारी अक्षत अर्पित करते है। फिर ऊब छट व्रत और गणेशजी की कहानी सुनने के बाद भी पानी नहीं पी सकते, जब तक चांद न दिख जाए। चांद दिखने के बाद चांद को जल के छींटे देकर कुमकुम, चन्दन, मोली, अक्षत चढ़ाकर भोग अर्पित कर अर्ध्य दिया जाता है।
ऊब छठ नियम
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ऊब छठ के व्रत का नियम है कि जब तक चांद नहीं दिखेगा तब तक महिलाओं को खड़े रहना पड़ता है। व्रती मंदिरों में ठाकुरजी के दर्शन कर पूजा अर्चना करके परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करती हैं और खड़े रहकर पौराणिक कथाओं का श्रवण करती हैं। इसके बाद एक ही जगह खड़े होकर परिक्रमा करे के व्रत खोला जाता है। लोग व्रत खोलते समय अपने रिवाज के अनुसार नमक वाला या बिना नमक का खाना खाते है।
षष्ठी तिथि
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पंचांग के अनुसार, षष्ठी तिथि 14 अगस्त को सुबह 4:23 बजे शुरू से होगी और 15 अगस्त को सुबह 2:07 बजे तक खत्म होगी। कोई भी व्रत उदया तिथि के आधार पर रखा जाता है, इसलिए हलषष्ठी 14 अगस्त को मनाई जाएगी। यह त्योहार रक्षाबंधन के 6 दिन बाद और जन्माष्टमी से पहले आता है।
पूजन सामग्री
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कुमकुम, चावल, चन्दन, सुपारी, पान, कपूर, फल, सिक्का, सफ़ेद फूल, अगरबत्ती, दीपक।
ऊब छठ व्रत कथा
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ऊब छठ का व्रत और पूजा करते समय ऊब छठ व्रत की कथा सुननी चाहिए। कथा इस प्रकार है कि, किसी गांव में एक साहूकार और इसकी पत्नी रहते थे। साहूकार की पत्नी रजस्वला होने पर भी सभी प्रकार के काम कर लेती थी। रसोई में जाना, पानी भरना, खाना बनाना, सब जगह हाथ लगा देती थी, उनके एक पुत्र भी था। पुत्र की शादी के बाद साहूकार और उसकी पत्नी की मृत्यु हो गई। अगले जन्म में साहूकार एक बैल के रूप में और उसकी पत्नी कुतिया बनी। ये दोनों अपने पुत्र के यहां ही थे। बैल से खेतों में हल जुताया जाता था और कुतिया घर की रखवाली करती थी। श्राद्ध के दिन पुत्र ने बहुत से पकवान बनवाये, जहां खीर भी बन रही थी। अचानक कहीं से एक चील जिसके मुंह में एक मरा हुआ सांप था, उड़ती हुए वहां आई और वो सांप चील के मुंह से छूटकर खीर में गिर गया। कुतिया ने यह देखा और उसने सोचा इस खीर को खाने से कई लोग मर सकते है। उसने खीर में मुंह अड़ा दिया ताकि उस खीर को लोग ना खाये। पुत्र की पत्नी ने कुतिया को खीर में मुंह अड़ाते हुए देखा तो गुस्से में एक मोटे डंडे से उसकी पीठ पर मारा। तेज चोट की वजह से कुतिया की पीठ की हड्डी टूट गई, जिसके बहुत उसे दर्द हो रहा था। रात को वह बैल से बात कर रही थी। उसने कहा तुम्हारे लिए श्राद्ध हुआ तुमने पेट भर भोजन किया होगा। मुझे तो खाना भी नहीं मिला, मार पड़ी सो अलग। बैल ने कहा मुझे भी भोजन नहीं मिला, दिन भर खेत पर ही काम करता रहा। ये सब बातें बहु ने सुन ली और उसने अपने पति को बताया। जिसके बाद उसने एक पंडित को बुलाकर इस घटना का जिक्र किया। पंडित में अपनी ज्योतिष विद्या से पता करके बताया की कुतिया उसकी मां और बैल उसके पिता है। उनको ऐसी योनि मिलने का कारण मां द्वारा रजस्वला होने पर भी सब जगह हाथ लगाना, खाना बनाना, पानी भरना था। उसे बड़ा दुःख हुआ और माता पिता के उद्धार का उपाय पूछा। पंडित ने बताया यदि उसकी कुंवारी कन्या भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्टी यानि ऊब छठ का व्रत कर, शाम को नहा कर पूजा करें। और उसके बाद बैठे नहीं ,फिर चांद निकलने पर अर्ध्य दे। अर्ध्य देने पर जो पानी गिरे वह बैल और कुतिया को छूए तो उनका मोक्ष हो जायेगा। जैसा पंडित ने बताया था कन्या ने ऊब छठ का व्रत किया, पूजा की चांद निकलने पर चांद को अर्ध्य दिया। अर्ध्य का पानी जमीन पर गिरकर बहते हुए बैल और कुतिया पर गिरे ऐसी व्यवस्था की पानी उन पर गिरने से दोनों को मोक्ष प्राप्त हुआ और उन्हें इस योनि से छुटकारा मिल गया। हे!
ऊब छठ माता, जैसे इनका किया वैसे सभी का उद्धार करना। कहानी लिखने वाले और पढ़ने वाले का भला करना। बोलो छठ माता की…. जय !!! यह व्रत कथा पढ़ने से फल की प्राप्ति होती हैं।
राजेन्द्र गुप्ता,
ज्योतिषी और हस्तरेखाविद

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