बुद्ध और यशोधरा: बारह वर्ष की प्रतीक्षा, प्रेम और आत्मबोध की कहानी
🌸 बुद्ध और यशोधरा: बारह वर्ष की प्रतीक्षा, प्रेम और आत्मबोध की कहानी 🌸
बारह वर्ष बाद जब बुद्ध घर लौटे, उन्होंने सबसे पहले कहा—
“अनाथ आनंद, महल मुझे जाना होगा।”
यशोधरा बारह वर्षों से प्रतीक्षा कर रही थी। उनके मन में गहरा क्रोध और दर्द भरा था, क्योंकि एक रात अचानक सिद्धार्थ चले गए थे। वह राजघर की राजकुमारी थीं, बड़ी अहंकारी और सम्मानित। उनकी चुप्पी और संयम उनके चरित्र की शक्ति को दर्शाता है।
बारह साल का यह क्रोध सिर्फ बुद्ध के सामने ही व्यक्त किया जा सकता था, क्योंकि केवल वही व्यक्ति था जिसने उसे छोड़कर जाने का आघात दिया था।
🌿 बुद्ध का दृष्टिकोण
बुद्ध जानते थे कि यशोधरा का क्रोध स्वाभाविक है। उन्होंने आनंद से कहा कि उन्हें थोड़ी देर अकेले छोड़ दिया जाए, ताकि यशोधरा अपने सारे भाव व्यक्त कर सके।
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ज्ञानी का झुकना: बुद्ध ने अपने ज्ञान और करुणा से स्वयं को झुकाया, ताकि यशोधरा अपने भाव व्यक्त कर सके।
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सत्य का उद्घाटन: वह व्यक्ति जो बारह साल पहले घर छोड़ गया, अब मर चुका था। जो आया था, वह अब ज्ञान और आत्मबोध के साथ एक नया पुरुष था।
🌿 यशोधरा का क्रोध और भाव
यशोधरा ने बारह वर्षों का दर्द, क्रोध और व्यथा व्यक्त की।
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उसने चीखी, चिल्लाई और रोई।
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अपनी आंखों से बहते आंसू—जो बारह साल तक रुके थे—उसे हल्का कर दिए।
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बुद्ध ने एक शब्द भी नहीं कहा। उनका मौन और स्थिरता, यशोधरा के क्रोध को उपचारित और शुद्ध करने वाला था।
🌿 परिवार और विरासत
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उनके पुत्र राहुल को भी बुद्ध ने दीक्षा दी।
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यशोधरा स्वयं संन्यस्त हुई और भिक्षुणी बन गई।
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बुद्ध ने अपने भिक्षापात्र को राहुल को सौंपा और कहा कि यही उनकी वास्तविक संपदा है।
बारह साल की प्रतीक्षा, क्रोध और भावनाओं का यह अद्भुत समुच्चय अंततः आत्मबोध, प्रेम और त्याग की महान शिक्षा में बदल गया।
🌿 संदेश
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प्रेम और प्रतीक्षा की शक्ति अपार होती है।
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सच्चा ज्ञान और करुणा दूसरों के क्रोध और दुःख को सहन करने में प्रकट होता है।
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भौतिक संबंधों की तुलना में आत्मिक बंधन और मोक्ष की प्राथमिकता महत्वपूर्ण है।
ज्ञानी झुकता है ताकि दूसरों को आत्मबोध की ओर मार्गदर्शन कर सके।
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