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हम ज़्यादा खाते हैं — इसलिए बीमार हैं

हम ज़्यादा खाते हैं — इसलिए बीमार हैं

दिन में तीन बार खाना: आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा स्वास्थ्य भ्रम

दिन में तीन बार भोजन करना
मानव इतिहास के सबसे बड़े स्वास्थ्य धोखों में से एक है।

कोई डॉक्टर यह बात खुलकर नहीं कहेगा।
कोई मेडिकल पाठ्य-पुस्तक इसे स्वीकार नहीं करेगी।

क्योंकि यह भ्रम
अनेक उद्योगों को जीवित रखता है
खाद्य उद्योग, दवा उद्योग, बीमा उद्योग और कर व्यवस्था।

इस सच को समझने के लिए
हमें आधुनिक युग से नहीं,
1750 से पहले की सभ्यता में लौटना होगा।


⏳ जब समय घड़ी से नहीं, सूर्य से चलता था

भारत ने कभी
घड़ी देखकर भोजन नहीं किया।

यहाँ भोजन होता था—

  • सूर्य की गति के अनुसार

  • ऋतु के अनुसार

  • श्रम के अनुसार

  • और सबसे महत्वपूर्ण — भूख के अनुसार

अधिकांश भारतीय
एक ही मुख्य भोजन करते थे।
कभी-कभी दो।
तीन कभी नहीं।

भोजन प्रायः
देर सुबह या दोपहर में होता था।
सूर्यास्त के बाद
भारी भोजन लगभग वर्जित था।


🌿 उपवास: सज़ा नहीं, जैविक बुद्धि

उपवास कोई दंड नहीं था।
वह संस्कृति था।
वह शरीर की भाषा था।
वह आत्म-अनुशासन था।

  • एकादशी

  • प्रदोष

  • नवरात्रि

  • चातुर्मास

  • ऋतु आधारित व्रत

भूख से डर नहीं था।
भूख का सम्मान था।


🌾 भोजन स्थानीय था — जीवन से जुड़ा था

खाना—

  • ताज़ा था

  • स्थानीय था

  • ऋतु के अनुरूप था

मोटे अनाज—

  • ज्वार

  • बाजरा

  • रागी

कंद-मूल, दालें,
देशी घी, दूध,
वन आधारित आहार।

चावल और गेहूँ
देवता नहीं थे।

रोग थे —
लेकिन मेटाबोलिक रोग नहीं थे।

  • मोटापा दुर्लभ था

  • मधुमेह लगभग अदृश्य

  • हृदय रोग जीवन-शैली नहीं बने थे

किसानों के शरीर
जिम के बिना सिक्स-पैक थे।


⚔️ जब अंग्रेज़ आए — और समय को उपनिवेश बनाया

अंग्रेज़ों ने केवल भूमि पर कब्ज़ा नहीं किया।
उन्होंने—

  • समय को उपनिवेश बनाया

  • भोजन को उपनिवेश बनाया

  • चयापचय (Metabolism) को उपनिवेश बनाया

उन्हें चाहिए थे—

  • अनुमानित मज़दूर

  • अनुमानित घंटे

  • अनुमानित उत्पादकता

इसलिए—

  • उपवास हटाया गया

  • अनियमित भोजन मिटाया गया

  • भोजन की स्वायत्तता छीनी गई

और धीरे-धीरे
एक नया ढाँचा खड़ा किया गया—

सुबह = नाश्ता
दोपहर = भोजन
रात = रात का खाना

यह स्वास्थ्य मॉडल नहीं था
यह कर वसूली और नियंत्रण का मॉडल था।


🍚 खाद्य संप्रभुता की हत्या

हर भारतीय घर
कभी एक खाद्य इकाई था—

  • आत्मनिर्भर

  • स्व-संरक्षित

  • स्व-पोषित

इसे तोड़ना ज़रूरी था।

मोटे अनाज हटाए गए।
चावल और गेहूँ थोपे गए।

क्यों?

  • आसान भंडारण

  • आसान परिवहन

  • आसान कर

  • आसान नियंत्रण

रसोई बाज़ार बन गई।
खेती नक़दी फसल बनी।
भोजन निर्भरता बन गया।


🇮🇳 1947: आज़ादी आई, व्यवस्था नहीं बदली

अंग्रेज़ गए,
पर मॉडल रह गया।

सरकार ने कहा—
“कितनी शानदार कर मशीन है!”

फिर आई हरित क्रांति

1950–60 के दशक में—

  • गेहूँ और चावल जम गए

  • MSP का नशा दिया गया

  • मोटे अनाज गायब हो गए

किसान उत्पादक नहीं रहे।
वे आपूर्तिकर्ता बन गए।


💊 फिर जन्मा बीमारी उद्योग

कार्बोहाइड्रेट-भारी आहार आया।
और साथ आए—

  • मधुमेह

  • उच्च रक्तचाप

  • हृदय रोग

  • मोटापा

बीमारियाँ अनुमानित थीं।
मरीज़ स्थायी।

बीमा फला-फूला।
अस्पताल बढ़े।
दवाइयाँ फूटीं।

सरकार मुस्कुराई—

  • भोजन कर

  • दवा कर

  • अस्पताल कर

  • बीमा कर

नागरिक बैटरियाँ बन गए—

खाओ → काम करो → दवा लो → कर दो → दोहराओ


🧬 काग़ज़ों में उम्र बढ़ी — जीवन नहीं

लोग ज़्यादा नहीं जी रहे।
वे सिर्फ़
ज़्यादा समय तक ज़िंदा रखे जा रहे हैं।

गोलियों पर।
इंजेक्शन पर।
रिपोर्ट्स पर।

स्वस्थ रहने के लिए नहीं—
कर देने के लिए ज़िंदा।

यह स्वास्थ्य नहीं है।
यह सभ्यतागत पतन है।


❓ असली प्रश्न

प्रश्न यह नहीं है—
“आप बीमार क्यों हैं?”

असल प्रश्न है—

जब आप दिन में तीन बार खाते हैं,
तो लाभ किसे होता है?


दिन में तीन बार भोजन
कोई जैविक आवश्यकता नहीं,
बल्कि एक औद्योगिक अनुशासन है।

स्वास्थ्य की वापसी
डाइट चार्ट से नहीं,
सभ्यतागत स्मृति से होगी।

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