Search for:
  • Home/
  • Uncategorized/
  • एक ऑटो, एक थप्पड़ और एक बुजुर्ग की खामोशी: समाज का आईना

एक ऑटो, एक थप्पड़ और एक बुजुर्ग की खामोशी: समाज का आईना

रोज़ की तरह मैं मथुरा से हाथरस के लिए निकल पड़ा।
रास्ते में एक ऑटो में बैठा।
ऑटो चलाने वाला एक बुजुर्ग था, उम्र लगभग 65 साल के आसपास रही होगी।

उन्होंने मुझसे कहा,
“एक सवारी और ले लूँ, फिर चलूँ?”
मैंने सहजता से जवाब दिया,
“ठीक है, कोई बात नहीं।”

कुछ ही देर में एक लड़का आया, कंधे पर एक बड़ा सा बैग टांगे हुए। वह ऑटो में बैठ गया।
फिर तीसरी सवारी भी आ गई और ऑटो चल पड़ा।

रास्ते में ऑटो वाले ने कुछ सवारियाँ बैठाईं, कुछ को उतारा।
कुछ दूरी पर वह लड़का, जो बैग लेकर बैठा था, उतरने लगा।
उसने ऑटो वाले को 10 रुपये का नोट दिया।

ऑटो वाले ने पैसे रख लिए।

तभी वह लड़का गुस्से में बोला—
“मैंने तो 5 रुपये बोलकर बैठा था!”

जबकि ऐसा कुछ कहा ही नहीं गया था।

बहस करने के बजाय, अचानक उस लड़के ने गुस्से में बुजुर्ग ऑटो वाले को थप्पड़ मार दिया,
और यही नहीं,
उसके गले में लटका पैसों का गल्ला भी निकाल लिया

वहाँ देखते ही देखते भीड़ इकट्ठा हो गई।
कुछ लोगों ने बीच-बचाव किया।
किसी ने सामने खड़े पुलिस वाले को बुला लिया।

पुलिस वाले ने उस लड़के को डांटा और कहा—
“पूरा 10 रुपये दो।”

तभी बुजुर्ग ऑटो वाले ने भी शांत स्वर में कहा—
“10 रुपये ही लगते हैं।”


🤍 इस घटना ने मुझे दो बातें सिखाईं

पहली बात
उस बुजुर्ग ने अपने पैसे खो दिए, अपमान सहा,
फिर भी कोई हंगामा नहीं किया।
उसने हालात को स्वीकार कर लिया — शायद मजबूरी में, शायद समझदारी में।

दूसरी बात
संभव है वह पुलिस के डर से या झगड़ा बढ़ने के भय से चुप रहा हो।
क्योंकि गरीब और बुजुर्ग आदमी अक्सर यह सोचता है—
“कहीं बात और न बिगड़ जाए।”


🪞 समाज के लिए एक सवाल

क्या आज का समाज इतना असंवेदनशील हो गया है कि
हम बुजुर्गों, मेहनतकशों और कमजोर लोगों पर हाथ उठाने से पहले
एक पल भी नहीं सोचते?

यह घटना सिर्फ एक ऑटो की नहीं थी,
यह हमारी सोच और हमारी संवेदनशीलता की परीक्षा थी।


🌱 अंत में

कभी-कभी खामोशी कमजोरी नहीं होती,
वह हालात से समझौता भी हो सकती है।

लेकिन सवाल यह है—
क्या हमें ऐसे समझौतों पर चुप रहना चाहिए?

Loading

Leave A Comment

All fields marked with an asterisk (*) are required