तपस्या का फल 🌞
तपस्या का फल 🌞
माता पार्वती की करुणा और भगवान शिव का आशीर्वाद
कथा
भगवान शंकर को पति रूप में पाने के लिए माता पार्वती कठोर तपस्या कर रही थीं। उनकी साधना लगभग पूर्ण हो चुकी थी। एक दिन वे गहन ध्यान में लीन थीं, तभी अचानक किसी बालक की डूबने की चीख सुनाई दी।
माता तुरंत वहां पहुँचीं और देखा कि एक मगरमच्छ बालक को पानी के भीतर खींच रहा है। करुणामयी पार्वती ने मगरमच्छ से निवेदन किया – “बालक को छोड़ दो, इसे आहार मत बनाओ।”
मगरमच्छ बोला – “माता, हर छठे दिन जो पहला प्राणी मिलता है, वही मेरा आहार होता है। यह ब्रह्मा की व्यवस्था है।”
माता पार्वती ने कहा – “तुम इस बालक को छोड़ दो, इसके बदले मैं तुम्हें अपनी तपस्या का फल देती हूँ।”
सहमति मिलते ही माता ने अपने कठोर तप का समस्त पुण्य फल मगरमच्छ को अर्पित कर दिया। तपस्या के फल से मगरमच्छ सूर्य की भांति प्रकाशमान हो गया और उसकी बुद्धि शुद्ध हो गई। उसने कहा – “माता, आप अपना पुण्य वापस ले लीजिए, मैं इस बालक को वैसे ही छोड़ दूँगा।”
लेकिन माता ने मना किया और बालक को गोद में लेकर स्नेहपूर्वक दुलार किया। फिर सुरक्षित लौटा कर अपने स्थान पर वापस आकर पुनः तप करने लगीं।
भगवान शिव का प्रकट होना
माता पार्वती की करुणा और निःस्वार्थ दान से प्रसन्न होकर भगवान शिव तत्काल प्रकट हुए। उन्होंने कहा –
“पार्वती, अब तुम्हें तप करने की आवश्यकता नहीं है। हर प्राणी में मेरा ही वास है। तुमने ग्राह को तप का फल दिया, वह मुझ तक ही पहुँचा। इसलिए तुम्हारा तपफल अनंत गुना हो गया। तुमने परहित और करुणा के लिए तप का त्याग किया, इसलिए मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ।”
सारांश
यह कथा हमें सिखाती है कि परहित और करुणा का फल सबसे महान तपस्या से भी श्रेष्ठ होता है।
जो व्यक्ति असहायों की रक्षा करता है, दयालु और करुणामयी होता है, उस पर भगवान की असीम कृपा होती है।
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