महाभारत युद्ध में अर्जुन के रथ पर विराजमान हनुमानजी की अद्भुत लीला
महाभारत का युद्ध केवल शस्त्रों और रणकौशल का नहीं था, यह दिव्य शक्तियों और महान चरित्रों का संग्राम भी था।
इस महायुद्ध में अर्जुन के रथ की ध्वजा पर पवनपुत्र हनुमानजी स्वयं विराजमान थे। उनकी उपस्थिति मात्र से ही अर्जुन का रथ अजेय हो जाता था।
कहा जाता है कि जब-जब कौरवों की सेना अर्जुन पर प्रचंड वार करती, हनुमानजी कभी-कभी रथ की ध्वजा पर से खड़े होकर कौरवों की ओर ऐसी दृष्टि डालते कि उनकी सेना तूफान की गति से युद्धभूमि छोड़ कर भाग जाती। हनुमानजी की दृष्टि का सामना करने का साहस किसी में नहीं था।
⚔️ कर्ण और अर्जुन का महासंग्राम
ऐसा ही दृश्य तब बना जब कर्ण और अर्जुन के बीच घोर युद्ध चल रहा था।
कर्ण ने अर्जुन पर भयंकर बाणों की वर्षा कर दी। उनके तीक्ष्ण बाण श्रीकृष्ण को भी लगने लगे, जिससे उनका कवच कटकर गिर गया और उनके कोमल अंगों पर घाव होने लगे।
ऊपर रथ की ध्वजा पर विराजमान हनुमानजी एकटक अपने आराध्य श्रीकृष्ण को देख रहे थे।
श्रीकृष्ण के शरीर पर घाव देखकर हनुमानजी से यह सहन न हुआ।
वो तुरंत उग्र गर्जना कर उठ खड़े हुए। उनकी गर्जना से आकाश, पाताल सब कंपायमान हो उठा।
कौरव सेना पहले ही भयभीत होकर भाग चुकी थी, अब पांडव सेना भी उनके क्रोध से कांपने लगी।
हनुमानजी का भयानक रूप देखकर कर्ण के हाथ से धनुष छूट गया और उनके सारथी कांप उठे।
🔥 श्रीकृष्ण ने शांत किया हनुमानजी का क्रोध
भगवान श्रीकृष्ण तुरंत उठ खड़े हुए और उन्होंने हनुमानजी को स्पर्श करके कहा —
“रुको! यह तुम्हारे क्रोध का समय नहीं है। यह त्रेतायुग नहीं, द्वापर युग है।
तुम्हारे तेज और पराक्रम को यहाँ कोई सहन नहीं कर सकता।
मैंने तुम्हें इस युद्ध में शांत रहकर बैठने को कहा था!”
हनुमानजी के नेत्रों में अभी भी अग्नि दहक रही थी, उनकी पूंछ आकाश में उठी हुई थी, दोनों हाथों की मुठ्ठियां भींची थीं।
श्रीकृष्ण के दृढ़ शब्दों और करुण स्पर्श ने हनुमानजी को शांत किया।
उन्होंने अपने आराध्य श्रीकृष्ण की ओर देखा और पुनः ध्वजा पर स्थिर होकर बैठ गए।
🙏 कथा से शिक्षा
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भक्ति में शक्ति छुपी है, परंतु ईश्वर की आज्ञा सर्वोपरि है।
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हनुमानजी जैसे परम शक्तिशाली भी प्रभु की आज्ञा का पालन करते हैं।
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श्रीकृष्ण की कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है।
🌺 जय श्री कृष्ण! जय पवनपुत्र हनुमान! जय जय श्री राधे! 🌺
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