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उदया तिथि का महत्व: क्यों त्योहार मनाए जाते हैं उदया तिथि के आधार पर? 🌼

उदया तिथि का महत्व: क्यों त्योहार मनाए जाते हैं उदया तिथि के आधार पर? 🌼

हिंदू पंचांग में तिथियों का विशेष महत्व है। हर व्रत और त्योहार तिथि के अनुसार ही मनाया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि त्योहार मनाने के लिए उदया तिथि ही क्यों मान्य होती है? आइए जानते हैं इसका धार्मिक और खगोलीय महत्व।


तिथि क्या है और यह कैसे गिनी जाती है?

हिंदू कैलेंडर में 12 माह होते हैं और प्रत्येक माह में 30 तिथियां।

  • कृष्ण पक्ष: पूर्णिमा से अमावस्या तक की 15 तिथियां।

  • शुक्ल पक्ष: अमावस्या से पूर्णिमा तक की 15 तिथियां।

इस प्रकार कुल 30 तिथियां होती हैं। तिथि की अवधि 19 से 24 घंटे तक होती है, इसलिए कई बार एक ही दिन में 2 तिथियां पड़ जाती हैं।


उदया तिथि का अर्थ

उदया तिथि वह तिथि है जो सूर्योदय के समय विद्यमान रहती है।
➡️ उदाहरण: यदि चतुर्थी तिथि सूर्योदय के समय है, तो उस दिन चतुर्थी मानी जाएगी, भले ही यह तिथि उसी दिन दोपहर में समाप्त क्यों न हो जाए।


त्योहार और व्रत में उदया तिथि का नियम

हिंदू धर्म में व्रत और त्योहार दो प्रकार से मनाए जाते हैं:

  1. दिन में मनाए जाने वाले पर्व – इनमें उदया तिथि मान्य होती है।

    • जैसे: गणेश चतुर्थी, रामनवमी, हनुमान जयंती, रक्षाबंधन, भाई दूज, गोवर्धन पूजा, रथ सप्तमी, छठ पूजा आदि।

  2. रात्रि में मनाए जाने वाले पर्व – इनमें व्यापिनी तिथि (मध्याह्न, प्रदोष, निशीथ) का महत्व होता है।

    • जैसे: जन्माष्टमी (निशीथ व्यापिनी अष्टमी), रामनवमी (मध्याह्न व्यापिनी नवमी), करवा चौथ (चंद्र उदय व्यापिनी चतुर्थी), दीपावली (रात्रि व्यापिनी अमावस्या)।


उदया तिथि क्यों जरूरी है?

  • उदया तिथि को मान्यता इसलिए है क्योंकि हिंदू पंचांग में दिन की शुरुआत सूर्योदय से मानी जाती है।

  • कोई भी तिथि अगर रात में शुरू होकर अगले दिन सूर्योदय तक रहती है, तो वही उदया तिथि मानी जाएगी।

  • उदाहरण: यदि चतुर्थी सुबह 10:30 तक ही है और उसके बाद पंचमी शुरू हो जाती है, तो पूरा दिन चतुर्थी का ही प्रभावी माना जाएगा।


तिथि और व्यापिनी काल

पर्व और व्रत तिथि के अनुसार अलग-अलग व्यापिनी काल में मनाए जाते हैं:

  • मध्याह्न व्यापिनी – रामनवमी, रक्षाबंधन

  • निशीथ व्यापिनी – जन्माष्टमी

  • प्रदोष व्यापिनी – प्रदोष व्रत

  • चंद्र उदय व्यापिनी – करवा चौथ

  • रात्रि व्यापिनी – दीपावली


त्योहार और व्रत केवल तिथियों पर नहीं, बल्कि उनके व्यापिनी काल और उदया तिथि पर आधारित होते हैं। यही कारण है कि पंचांग देखकर ही त्योहारों की तिथि तय की जाती है।

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