Search for:

लांग्गली का पौधा

ये लांग्गली का पौधा है इसे कलिहारी और अग्निशिखा के नाम से भी जाना जाता है।

ये एक प्रकार का उपविष होता है, ये प्रयोग वात रोग नाशार्थ हेतु अक्सीर है। कलिहारी के पंचाग का स्वरस और कस्तूरी हल्दी का स्वरस दोनों को समान मात्रा में लेकर अगल रखें अब किसी मिट्टी के पात्र में एक किलो भैंस के दूध में 20 ग्राम असली कश्मीरी केशर डालकर मंद अग्नि पर पकाये जब दूध का रंग केसरिया रंग का हो जाए तब उतार लें एक किलो की जगह डेढ़ किलो दूध प्रमाण ले तो बेहतर होगा आधा जल कर एक किलो रह जायेगा। अब इसकी दही जमा कर जो स्वरस पहले से रखा हुआ है उसमें मिलाकर लकड़ी की मथानी से मथ लें।

फिर इसमें

  • मीठा तेलिया 50 ग्राम
  • अजवायन सत् 20 ग्राम
  • एलुवा 70 ग्राम
की मात्रा में पीसकर मिला कर किसी मिट्टी के मटके में भरकर उपर से सकोरा रखकर गिली मिट्टी से मुॅह बंद करके कपड़ मिट्टी करके पलास के पेड़ के नीचे गड्ढा खोद कर दो महिने के लिए गाड़ देना है। तत्पश्चात इसको छानकर किसी लाल बोतल में भरकर तीन दिनों के लिए धूप में रख दें किसी लकड़ी के पटरे के उपर डायरेक्ट जमीन पर नहीं रखना है। तीन दिन के पश्चात ये तेल करामाती दर्द निवारक तेल तैयार हो गया और बहुत ज्यादा लुब्रीकेटेड।
वात रोग में दर्द वाले स्थान पर 4-5 बूँद लगाकर स्तेमाल करने से दर्द का शमन होने लगता है। इसी के साथ शुद्ध मीठा तेलिया और कस्तूरी हल्दी को घन करके काबली चने के आकार की गोली बना कर एक -एक गोली सुबह शाम हल्के दूध के साथ प्रयोग करें
ये पोस्ट जनहित में जारी किया गया है और बनाने का पूरा तरीका बगैर छुपाये प्रकाशित किया है ताकि जन समुदाय का रूझान वनस्पति के प्रति बढ़े और आज के समय में जो लोग जोड़ के दर्द से परेशान है उनको 100% लाभ मिल सके।
ये एक चमत्कारी गुप्त रहस्य था मेरे सीने का राज जो जन कल्याणार्थ प्रकाशित कर दिया है।

Loading

Leave A Comment

All fields marked with an asterisk (*) are required