ममता या मोह? एक मां के अवैध संबंधों की अधूरी कहानी-भाग 4
ममता या मोह? एक मां के अवैध संबंधों की अधूरी कहानी-भाग 4
जिसने बेटे की जिंदगी बदल दी –
लेखक-डॉ. वेद प्रकाश
8709871868,8051556455
दर्द, विश्वासघात, पितृत्व की ताकत, आत्मिक जागरण, क्षमा की राह।
मृत्युंजय अब ठीक हो चुका था अस्पताल से छुट्टियां मिल चुकी थी और उसने सामान्य जीवन अपने घर पर बिता रहा था।समय की धीमी चाल में दिन बीत रहे थे, जैसे कोई घाव धीरे-धीरे मवाद भरता हो।
मृत्युंजय का अस्पताल का कमरा अब उसके जीवन का आईना बन चुका था – ठंडी दीवारें, बेसुरा ड्रिप का स्वर, और हर रात नींद से पहले मां की याद जो चाकू की तरह सीने में चुभती।
वो रात जो सदमे की आग बन गई। पिता डॉ. वेद मृत्युंजय के पिता, दिनभर मरीजों की सेवा में लगे रहते, लेकिन रातें उनके लिए एक अनकही जंग का मैदान यह गयी थीं।
रात नौ बजे से दस बजे तक का समय – वो स्वर्णिम घंटा जब वे बाहरी रोगियों को निःशुल्क इलाज देते। फोन की घंटी बजती, और हर कॉल एक नई कहानी लाती।
लेकिन उस रात, वो कॉल एक तूफान बनकर आया। जिसका कॉल अभी आया था उसी व्यक्ति का पहला कॉल दोपहर में भी आया। पिता व्यस्त थे – किसी बुजुर्ग मरीज की सांसें थम रही थीं।
मोबाइल की घंटी ने मृत्युंजय को परेशान कर रखा था उसने मोबाइल अपने पिता को देते हुए हाथ आगे बढ़ाया तभी उनके पिता ने कहा-“बेटा, छोड़ दो,” उन्होंने मृत्युंजय से कहा, जो पास ही बैठा किताब पढ़ रहा था। — “बाद में बात कर लूंगा।” उनके डॉक्टर पिता ने कहा।
मृत्युंजय ने फोन काट दिया, लेकिन मन में एक अजीब सी बेचैनी घर कर गई। रात ढल चुकी थी। घड़ी ने नौ बज गए। अस्पताल का कॉरिडोर सूना पड़ गया था, सिर्फ दूर कहीं राहगीर की चप्पलों की आहट और कुत्ते भोंकने की आवाजें, क्योंकि इस समय मृत्युंजय के पिता जो एक डॉक्टर है रेसिडेंस (घर)पर आ जाते हैं।
तभी फोन फिर बजा। पिता ने फोन को स्पीकर पर ले लिया, मृत्युंजय पास ही कुर्सी पर बैठा चाय पी रहा था। कॉल करने वाले की आवाज़ कर्कश थी, जैसे कोई पुराना जख्म फिर से फट गया हो। “डॉक्टर साहब, वो रीना…वो….. रीना …या वंदना………आपकी पत्नी… अरे, वो वैश्या! वो रखैल! हमारे साथ क्या-क्या नहीं किया मैंने!” मृत्युंजय का हाथ कांप गया।चाय का प्याला फर्श पर गिरा, लेकिन शब्दों का शोर उसे दबा गया।
पिता शांत थे, जैसे समुद्र की गहराई में कोई तूफान न हो। “हां भाईसाहब, बताइए,” उन्होंने कहा, आवाज़ में नाराजगी का लेश मात्र नहीं।
फोन के रिसीवर की एयरफोन से डॉक्टर साहब के कानों में सुनाई दिया-डॉक्टर साहब की जय हो……. और डॉक्टर साहब….. कैसे हैं?
इधर डॉक्टर साहब ने शालीनता भरे शब्दों में पुछा -आप कौन?
और सुनाइए डॉक्टर साहब…. कैसे हैं आप?
मैं दीप नारायण शास्त्री हूं।
हां भाई… हां… दिन में भी आपके कॉल आ रहे थे परंतु मैं पेशेंट के साथ काफी इंवॉल्व रहने के कारण आपका कॉल नहीं उठा पाया और आपसे बात नहीं हो पाई।
शास्त्री ने पुनः कहना शुरू किया। बहुत ही जरूरी है पहले अपना कर्तव्य फिर दूसरों का कर्तव्य।
आपकी तबीयत ठीक है ना डॉक्टर साहब?
हमारी तबीयत को क्या हो गया था भाई….. और इस तरह के प्रश्न मुझसे क्यों? डॉक्टर साहब ने जवाब दिया।
हां सुनते हैं मैडम आपकी आपके साथ नहीं रहती है? और उससे आप काफी दुखी है, काफी परेशान है?
जी नहीं….बिल्कुल भी नहीं मैं बिल्कुल परेशान नहीं हूं आप चिंता ना करें। डॉक्टर साहब ने स्पष्टता और सहजतापूर्वक जवाब दिया
हां आपकी वाइफ का वंदना…. नाम है या रीना…?
यह सुनकर के डॉक्टर साहब को समझते देर ना लगी फिर भी अपने आप को कंट्रोल किया और बातें पुन: शुरू करते हुए डॉक्टर साहब ने शांतिपूर्वक कहा -दोनों नाम है रीना से मैंने उसे MA तक पढ़ाया और वंदना से इंटर तक।
फिर उधर से आवाज आई वह तो अब इग्नू ओपन विश्वविद्यालय से BA कर रही है हिंदी से।तीन दिन तो मेरे साथ रहकर के गई है।
मृत्युंजय की मां के नाम पर लगे कलंक के धब्बे उस आदमी ने उगलना शुरू किया, जैसे जहर की नदी बह निकली हो। “डॉक्टर साहब, रीना ने हमारे साथ संभोग किया! हां, साफ-साफ कहता हूं। कई रातें! और वो आपका छोटा बेटा… रिटर्न गिफ्ट में हजारों रुपये उड़ा दिए मेरे। सोनपुर मेला याद है? उड़न खटोला में साथ चढ़े, हंसे-खेलें, जैसे कोई पराई न हो!” हर शब्द मृत्युंजय के कानों में गोला फट रहा था।
मां… वो मां, जिसके आंचल की छांव में वो बचपन बिताया। जिसके हाथों की रोटी में स्वर्ग था। अब वो वैश्या? रखैल? संभोग? उड़न खटोला?
मृत्युंजय का खून खौल उठा। आंखें लाल हो गईं। वो पिता को इशारा करने लगा – ‘काट दो फोन! मारो इनको!’लेकिन पिता ने सिर्फ आंखों से इशारा किया: ‘शांत रहो, बेटा।’ और वो अपने भी गाय की तरह शांत बने रहे।
“और बताइए भाईसाहब,” उन्होंने कहा। आदमी ने जारी रखा, “मैं शास्त्री हूं, ब्रह्मचारी था। रीना ने मेरा ब्रह्मचर्य तोड़ा! कलंक लगा दिया। मैं एक शिक्षक भी हूं, बदनाम कर दिया। आपकी आत्मा ये स्वीकार नहीं करेगी!”
मृत्युंजय के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। कमरे की रोशनी घूमने लगी। चेहरा सफेद पड़ गया, आंखों के सामने अंधेरा।
मां… मेरी मां… ये सब? वो जो रातों को लोरी सुनाती थी, अब ये? दिल की धड़कन रुक सी गई। वो कुर्सी से फिसलकर गिर पड़ा, जैसे कोई निर्जीव पुतला।
पिता ने फोन समेटा, लेकिन बेटे को देखा तो दौड़े ।”बेटा! मृत्युंजय!” उन्होंने दवा का डोज दिया – दो गोलियां जीभ पर रखीं।
मृत्युंजय का चेहरा मौत जैसा था। कुछ पल बाद होश आया। आंखें खुलीं, पिता सामने।मृत्युंजय ने हिम्मत जुटाई। आवाज़ कांप रही थी, लेकिन गुस्सा ज्वालामुखी बन फूट पड़ा। “पापा! आप डॉक्टर बाद में हो, पिता पहले! मेरी मां के बारे में ये गंदी बातें कैसे सुनते रहे? आपको गुस्सा नहीं आया? वैश्या कहते रहे, रखैल… संभोग! सोनपुर मेला! हजारों रुपये! और आप चुप?” आंसू बहने लगे, गुस्से के साथ दर्द मिलकर नदी बन गए। सीना फटने को था।पिता ने उसे बाहों में कस लिया।
उनका चेहरा शांत था, लेकिन आंखें गीली। धीमे स्वर में बोले, “बेटा, हर समस्या का निदान गुस्सा नहीं है। अगर मैं उत्तेजित हो जाता, तो वो सब न बताता। जोश, जल्दबाजी में हर कदम गलत साबित होता है। शालीनता से समस्या सुलझती है।
मैंने इसलिए सुना, ताकि सच्चाई सामने आए।अब तू माफ करना, लेकिन ये दर्द तुझे मजबूत बनाएगा।” मृत्युंजय सिसकने लगा।
“पापा, ममता क्या है? मोह क्या? मां ने मुझे छोड़ दिया समाज के डर में। अब ये? क्या मैं कभी उसकी आंखों में देख पाऊंगा?
” पिता ने सिर सहलाया। “बेटा, ममता वो आग है जो जलाती भी है, रोशन भी करती। मोह अंधा है, लेकिन सच्चाई मुक्त करती। तू रो मत, ये दर्द तेरी ताकत बनेगा।”राख और आत्मग्लानि दूसरी तरफ, रीना नवादा में फंसी थी। चुनाव का शोर, झंडे लहराते, नारे गूंजते। लेकिन उसके मन का शोर उनसे बड़ा था। पाठक के घर में रहती, छोटे बेटे के साथ।
ससुराल? बड़ा बेटा? वो नाम ही भूल चुकी थी। रातें कटतीं आईने के सामने। “रीना, तूने क्या किया?” आत्मा चीखती।
मोहल्ले की औरतें फुसफुसातीं: “बेचारी, न घर की, न घाट की। जवानी जाएगी, फिर बेटे की गोद ढूंढेगी।
“उधर उनके पिता जो एक डॉक्टर थे रात के गहराइयों में सपनों के साथ खोए थे।उस रात, जब कॉल आया पिता को, रीना को पता चला। फोन पर वो भी थी? नहीं, लेकिन शिकायतें उसी की।
दिल डूब गया। “मैंने सब बर्बाद कर दिया। मृत्युंजय… मेरा बेटा…” आंसू बहते, लेकिन रीना के मोह ने रोक लिया।
समाज का डर, पाठक का जाल। लेकिन अब टूटन शुरू हो गई। इतना देखने के बाद वह सपना चली गई टूट गई और मृत्युंजय के पिता ने अपने बेड पर हाथों से अगल-बगल देखा मानो वह अपनी प्यारी रीना को खोज रहे हो परंतु अफसोस वह तो किसी और की बन गई।
पिता की सीख: दर्द से जन्म लेती उम्मीद –कुछ दिन बीते। मृत्युंजय डिस्चार्ज हो गया। घर लौटा, लेकिन मन भारी। पिता हर शाम बात करते। “बेटा, जीवन उपन्यास है। हर अध्याय दर्द लाता, लेकिन अंत में सीख। तेरी मां मोह में फंसी, लेकिन तू ममता का दीपक बन। समाज डराता है, लेकिन सच्चाई मुक्त करती।
गुस्सा मत कर, समझ।” एक रात, मृत्युंजय ने कहा, “पापा, मैं बदलूंगा। कोई बच्चा मेरी तरह न दुखी हो। डॉक्टर बनूंगा, लेकिन लोगों के दिलों का भी।
“पिता मुस्कुराए। “यही तो मोटिवेशन है, बेटा। दर्द वो आग है जो सोने को तपाती, चमकाती। तू चमक।
” मृत्युंजय का पुनर्जन्म-घर लौटने के बाद मृत्युंजय की जिंदगी एक सूनी कोठरी सी हो गई। हर कोने में मां की परछाईं नाचती – वो आंचल जो कभी सहारा था, अब कांटों का जाल।
सुबह की पहली किरणें खिड़की से चुरा-चुरा आतीं, लेकिन उसके मन का अंधेरा नहीं मिटता।
पिता डॉ. वेद हर शाम लौटते, थके कदमों से, लेकिन आंखों में वही शांत ज्योति। “बेटा, उठ। जीवन रुकता नहीं, बस हम रुक जाते हैं।”मृत्युंजय बिस्तर पर पड़ा सिसकता। “पापा, वो शास्त्री की आवाज़… ‘वैश्या, रखैल’… मां के होंठों पर वो हंसी सोनपुर मेले की… सब झूठ? या सच?
” आंसू गालों से लुढ़कते, गद्दी भिगोते। पिता बैठते, हाथ थामते।
“सच जहर है, बेटा, लेकिन झूठ से भी बदतर। तेरी मां मोह की गुलामी में फंसी। ममता ने उसे बांधा, मोह ने तोड़ा।
लेकिन तू? तू उठ। दर्द तेरी जड़ें मजबूत करेगा।”दिन बीतते, मृत्युंजय धीरे-धीरे उठने लगा। पिता के अस्पताल में जाता। छोटे-छोटे मरीजों को देखता – एक बच्ची की आंखों में वही दर्द, जो उसका अपना था। “अंकल, मम्मी चली गईं,” बच्ची रोती। मृत्युंजय का गला भर आता। वो झुकता, गोद में उठाता। “बेटी, मम्मी लौटेंगी। और तू मजबूत बनेगी।” शब्द उसके अपने थे।
पिता मुस्कुराते दूर से देखते।एक शाम, बारिश की बूंदें खिड़की पर ठप्पड़ मार रही थीं। मृत्युंजय ने किताब खोली – मेडिकल की। पिता ने दी थी। “पढ़, बेटा। डॉक्टर बन। न सिर्फ शरीर के घाव भर, दिल के भी।
” पन्ने पलटते, आंसू टपकते। हर शब्द में मां की याद – वो रोटी बनाती, लोरी सुनाती। “ममता क्या है?” मन चीखता।
पिता बोले, “ममता त्याग है, बेटा। तेरी मां ने त्यागा, लेकिन तू अपनाओ।
