Search for:

ममता या मोह? भाग 5:

ममता या मोह? भाग 5:

अधर में लटका न्याय, हृदय का रक्तिम उद्गारमृत्युंजय के हाथों में वो आवेदन पत्र था—कागज के वे टुकड़े जो अब उसके जीवन का सबसे भारी बोजह बन चुके थे।
हर शब्द, हर अक्षर चाकू की धार से तेज़, सीधे हृदय को चीरता हुआ।
“बदचलन… ऑडियो प्रमाण… सृजन आर्ट… विजय शंकर पाठक…” ये शब्द उसके कानों में शास्त्री की उस कर्कश, ज़हरीली आवाज़ की गूंज के साथ घुल-मिल रहे थे—
“रीना ने संभोग किया… रखैल… वैश्या… सोनपुर मेला… हजारों रुपये उड़ा दिए!”

नवादा की सर्द जनवरी हवाएं गलियों में सांय-सांय कर रही थीं, लेकिन उसके मन का आग्नेय ज्वालामुखी फटने की कगार पर था।
घर लौटते कदम भारी, जैसे पैरों में सीमेंट के ब्लॉक बंधे हों। बचपन की वो मां—आंचल की छांव, हाथों की रोटी में स्वर्ग—अब कलंक की मूर्ति बन चुकी थी।
आंखों से खून के आंसू बह रहे थे, गालों को लावा की तरह जलाते हुए।
उस रात पिता डॉ. वेद प्रकाश के लौटने पर मृत्युंजय ने पत्र टेबल पर पटका। “पापा! ये क्या लिख दिया? मां को बदचलन कहा? सास-ससुर पर आरोप? मैं कलंक की औलाद बनकर सांस कैसे लूंगा? मुझे ऐसी मां से दूर करो! जला दो ये बंधन!” आवाज़ कांप रही थी, आंखें खून से लाल, मुट्ठियां बंद।
पिता ने शांत नेत्रों से पत्र पढ़ा, फिर बेटे को बाहों में कस लिया। “बेटा, ये सत्य की पहली सीढ़ी है।
गुस्सा आग है—जलाएगा। धैर्य से समझ। परिवार बचाने को कदम उठाया।”
लेकिन मृत्युंजय का हृदय फट चुका था। “समझ किसकी? शास्त्री की गंदी बातें… सोनपुर का उड़न खटोला… हजारों रुपये… और अब ये पत्र?
मैं वैश्या की संतान कहलाकर नहीं जiyूंगा! एक्शन लो, पापा! तलाक! पंचायत! मुक्ति दो!”
पिता ने गहरी सांस ली, डॉक्टर की तरह धैर्य से बोले, “समिति ने नोटिस भेज दिया। नाना-नानी को। 25 जनवरी को फैसला। इंतजार कर, न्याय होगा।”
लेकिन इंतजार? वो तो मौत का इंतजार था—हर पल हृदय को चीरता।रात भर मृत्युंजय बिस्तर पर लोटता रहा।
नींद आती ही मां का चेहरा नाचता—लोरी गाती: “निद्रा देवी आ जा रे…” लेकिन अब वो लोरी जहर की बूंदें बन टपक रही थी। आरपीएस स्कूल की फुसफुसाहटें कानों में गूंजीं: “तेरी मम्मी पाठक की रंडी है… फंसी हुई!” तब चुप रहता था, लेकिन अब ज्वालामुखी फूटा।
“ममता क्या है, पापा? मोह का छलावा? विश्वासघात की आग?”
सुबह पिता के चरणों में गिर पड़ा, आंसू की धार: “मैं कलंक से मुक्त करो! समाज हंसता है, दोस्त चुभाते हैं।
“नोटिस का हाहाकार: – षड्यंत्र का काला जाल— कुछ दिनों बाद समिति से खबर—नोटिस हिसुआ के खानखानापुर पहुंचा।
मृत्युंजय के नाना-नानी रामचंद्र पंडित का संसार ढह गया। चेहरा पीला, हाथ कांपते:
“वेद ने बदनामी करा दी!
पंचायत बुलाएगी तो क्या होगा?”
रीना को फोन: “रीना, तूने सब उजाड़ दिया!”
रीना नवादा में पाठक के घर छिपी, आवाज़ कांपती: “पापा, कुछ नहीं किया… पाठक मदद कर रहा।”
लेकिन हृदय में डर का सैलाब—मोह का जाल जकड़ रहा था, सत्य की आग चाटने लगी। “समाज ने खाना-पीना दिया ही नहीं, अब फैसला क्या देगा? मैं ऐसे समाज को नहीं मानती!”
नाना-नानी लज्जा से कांपे—शास्त्री के ऑडियो की गंदी बातें याद आईं: “रीना ने ब्रह्मचर्य तोड़ा… संभोग… वो चीजें जो डॉक्टर को भी न पता हों!” आना नहीं चाहते थे—
लज्जा का पहाड़ कुचल रहा था।षड्यंत्र बुनने लगे।
पाठक अब दहसील सराई नहीं जाता—खतरा। रीना खुद नवादा आती, पाठक के आंगन में छिपती और ये सोचती कि “बड़े बेटे का न दर्शन होगा न ही पति को भनक लगेगी। बेवकूफ हैं ये दोनों!”
पाठक हंसता: “रिश्वत दे देंगे समिति को।” रीना चुप, आंखें नम—छोटा वेदांत कार्टून देखता बेखबर।
सृजन आर्ट की वो रातें याद—लॉकडाउन में छह माह घर में पाठक… मोह की शुरुआत। अब फल: कलंक।
नोटिस से सतर्क।”
मृत्युंजय का दिल फटा—खून के आंसू। “भगवान, ये कैसी मां?” हनुमान मंदिर दौड़ा। घुटनों पर: “प्रभु, ताकत दो! कलंक से मुक्ति!” प्रार्थना में सिसकियां—हृदय झकझोरते आंसू। ज्वालामुखी भगवान की ओर मुड़ा—गुस्से से प्रार्थना। “मैंने क्या गुनाह किया?
ममता का बोझ, मोह का दंश!”अधर का इंतजार: 25 जनवरी की काली छाया —
घर लौटकर पिता से: “पापा, षड्यंत्र! मां नवादा में। रीना आने को तैयार नहीं—समाज को कोसती। नाना-नानी लज्जा से!”
पिता मुस्कुराए: “बेटा, सत्य छुपता नहीं। ऑडियो हैं—शास्त्री के, गंदे राज़। 25 जनवरी को सब खुलेगा।”
गले लगाया: “डॉक्टर बन, दिलों का। दर्द ताकत बनेगा।” मृत्युंजय किताब खोली—मेडिकल पन्ने मां की यादों से भीगे। लेकिन प्रेरणा बनीं।
इंतजार की मार—हर दिन हृदय चीरती। रीना फोन पर चीखती: “समाज ने कुछ दिया नहीं! फैसला? हंसी!”
नाना-नानी: “गंदे ऑडियो से लज्जा!” पंचायत अधर में—न्याय की तलवार लटकी।
मृत्युंजय रातें काटता: “कब आएगा फैसला? कलंक कब धुलेगा?”समिति कार्यालय में तनाव।
अध्यक्ष: “रीना-पिता न आएं तो ex-parte? लेकिन बच्चे दांव पर!” वेद चुप—धैर्य की मूर्ति। मृत्युंजय ज्वालामुखी: “मैं माफ न करूंगा!” पड़ोसी फुसफुसाते: “रीना भागी, पंचायत फेल?” हृदय रक्तिम—आंसू रुकते नहीं।
पंचायत का आगमन: सत्य का महायुद्ध (25 जनवरी की कल्पना)25 जनवरी, 2026। नवादा कुम्हार प्रजापति कार्यालय—हवा तनावपूर्ण। अध्यक्ष कुर्सी पर। वेद संग—मृत्युंजय आंखें ज्वाला।
रीना न आई—फोन पर बहाना: “समाज का फैसला न मानूंगी!” नाना-नानी अनुपस्थित—लज्जा। पाठक बाहर।
अध्यक्ष गरजा: “ऑडियो चलाओ!” शास्त्री की आवाज़: “रीना… संभोग… रखैल… वो राज़ जो डॉक्टर न जानें!”
समिति सन्न।
गवाह: “पाठक घर में छह माह!”
फैसला: “रीना लौटे! संपत्ति वापस! दूरी पाठक से! न आने पर ex-parte—संपत्ति जब्त, बच्चों को वेद!”
मृत्युंजय चीखा: “कलंक! मुक्ति!”
पिता: “क्षमा सीखो।”
तभी मृत्युंजय का हृदय फट पड़ा। ज्वालामुखी उमड़ा। वो खड़ा हुआ, भरी सभा में चीखा—
आवाज़ गरज, आंसू खून के: “क्या यही पंचायत है?!
क्या पंचायत में दम नहीं बचा?
न्याय दिलाना आपका काम नहीं?
कोई अधिकार नहीं?!
यही अपमान सहते रहेंगे?
समाज… क्या हो गया—कंस्पिरेटरों का अड्डा?!”
हर शब्द तीर, सीधा हृदय चीरता। सभा सन्न। एक बुजुर्ग सदस्य की आंखें नम। युवा की मुट्ठियां बंद। अध्यक्ष कांपा।
मृत्युंजय रोता हुआ: “मेरी मां कलंक! वैश्या कहलाती, लेकिन आप चुप?
षड्यंत्र बुनते रहें—रीना, पाठक! बच्चे दांव पर, और पंचायत लाचार?!”
हृदय झकझोरते शब्दों ने सभा जगा दी—हर चेहरा अपराधबोध से लाल।
एक महिला रो पड़ी: “बेटा, तेरी पीड़ा हमारी।”ज्वालामुखी का सैलाब:
मृत्युंजय का उद्गार मृत्युंजय का गला भरा, लेकिन रुका नहीं। “देखिए! मैं 16 का लाल। बचपन मां के आंचल में बीता—रोटी में स्वर्ग, लोरी में नींद। लेकिन शास्त्री की कॉल: ‘रीना रखैल! संभोग! सोनपुर मेला!’ स्कूल में फुसफुसाहट: ‘रंडी की औलाद!’
और आप? पंचायत? नोटिस भेजे, लेकिन रीना कोसती: ‘समाज ने कुछ नहीं दिया!’ नाना लज्जा? गंदे ऑडियो से? वो ऑडियो मेरे कानों में गोला फोड़े! क्या यही न्याय?
अपमान सहें? बच्चे अनाथ हों?” आंसू की धार—खून से लाल, गाल जला रहे। पिता ने हाथ थामा, लेकिन मृत्युंजय हटा:
“पापा, चुप्पी ने सब बर्बाद किया! पंचायत, जागो! दम दिखाओ!
“सभा में सन्नाटा। एक सदस्य: “बेटा, हम ex-parte…”
मृत्युंजय गरजा: “Ex-parte? कलंक धुलेगा कैसे? रीना नवादा में पाठक के आंगन! षड्यंत्र: ‘रिश्वत देंगे!’ बच्चे क्या गुनाह करें? मैं कलंक से मुक्त होऊं—डॉक्टर बनूं, लेकिन मां का दाग? समाज हंसेगा!”
बुजुर्ग रोए: “तेरी चीख जगा गई।” युवा चिल्लाए: “न्याय दो!” अध्यक्ष उठा: “मृत्युंजय, तेरी पीड़ा सत्य। कठोर फैसला लेंगे!”
पिता का धैर्य: शांत ज्योति का प्रकाश –वेद प्रकाश खड़े हुए। “समिति महोदय, मेरा बेटा दर्द से ज्वालामुखी। लेकिन क्षमा सिखाओ। मैंने एमए पढ़ाया, जमीन दी। बदले में मोह। लेकिन बच्चे ममता के हकदार।”
आवाज़ शांत, आंखें गीली। सभा प्रभावित।
मृत्युंजय सिसका: “पापा, आप सहते रहे…”
वेद प्रकाश ने अपने बेटे मृत्युंजय की तरफ से सारा करते हुए कहा “धैर्य से बड़ा कोई हथियार नहीं होता बेटा।

Loading

Leave A Comment

All fields marked with an asterisk (*) are required