पितृपक्ष 2025: श्राद्धकर्म करते समय इन बातों का रखें विशेष ध्यान
🌹पितृपक्ष 2025: श्राद्धकर्म करते समय इन बातों का रखें विशेष ध्यान🌹
पितृपक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए अत्यंत पवित्र काल माना जाता है। इस दौरान श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य के माध्यम से पितरों को स्मरण किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध कर्म करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना चाहिए ताकि पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद दें और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहे।
⚜️श्राद्ध पक्ष में नित्य करें ‘तर्पण’
शास्त्रानुसार विष्णु की स्तुति, देवी का अर्चन, सूर्य को अर्घ्य और पितरों को तर्पण करना अत्यंत प्रिय माना गया है।
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तर्पण कुतप काल (दोपहर का समय) में करना श्रेष्ठ है।
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इसमें काले तिल, दूध, पुष्प, कुश, तुलसी और गंगाजल/नर्मदा जल का उपयोग करें।
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तर्पण सदैव पितृ तीर्थ (तर्जनी और अंगूठे के मध्य स्थान) से करना चाहिए।
⚜️लोहे या स्टील के पात्रों का उपयोग न करें
शास्त्रों में श्राद्ध कर्म में लोहे और स्टील के बर्तनों का प्रयोग वर्जित बताया गया है।
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श्राद्ध के लिए चांदी के पात्र सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं।
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यदि चांदी उपलब्ध न हो तो तांबे के पात्र का प्रयोग करें।
⚜️श्राद्ध में ‘वृषोत्सर्ग’ का महत्व
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शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध के समय वृषोत्सर्ग (नंदी का दान) अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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यह दान गौदान के समान फलदायी माना गया है।
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ध्यान रहे कि यह कर्म केवल पुरुषों के लिए ही करना चाहिए।
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वृषोत्सर्ग के बिना श्राद्ध अधूरा और निष्फल माना जाता है।
⚜️आमान्न दान से श्राद्ध की संपन्नता
कई बार परिस्थितियोंवश ब्राह्मण भोजन कराने में असमर्थ लोग आमान्न दान करके श्राद्ध पूरा कर सकते हैं।
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आमान्न दान का अर्थ है अन्न, घी, गुड़, नमक जैसी वस्तुएँ किसी ब्राह्मण को देना।
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ग्रामीण क्षेत्रों में इसे ‘सीदा देना’ भी कहा जाता है।
⚜️श्राद्ध पक्ष में करें ‘पितृ स्तुति’
श्राद्ध काल में प्रतिदिन मार्कण्डेय पुराण में वर्णित ‘पितृ स्तुति’ करने से पूर्वज प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।
इससे पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है और परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है।
पितृपक्ष का महत्व केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का प्रतीक है। श्राद्ध, तर्पण, दान और पितृ स्तुति से पितरों की आत्मा प्रसन्न होती है और जीवन में सुख-शांति आती है।
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