पावर और पोज़िशन के बीच कहीं छूटता मातृत्व…
पावर और पोज़िशन के बीच कहीं छूटता मातृत्व…
आज मैं एक नहीं, बल्कि दो ऐसी सच्चाइयाँ साझा करना चाहता हूँ, जो आधुनिक जीवन की दौड़ में रिश्तों की बदलती प्राथमिकताओं को दिखाती हैं।
पहली कहानी
एक माँ थी — सफल, सक्षम और अपने कार्यक्षेत्र में अत्यंत प्रतिष्ठित।
समाज में सम्मान, पद और प्रभाव — सब कुछ उसके पास था।
लेकिन शायद इस सफलता की कीमत बहुत बड़ी थी।
उसका छोटा सा बच्चा बचपन से ही माँ के स्नेह को तरसता रहा।
माँ हमेशा व्यस्त रही — कभी पद की जिम्मेदारियों में, कभी अधिकारों की दौड़ में, तो कभी अपनी पहचान बनाए रखने के संघर्ष में।
समय बीतता गया…
आज वही बच्चा बड़ा होकर स्वयं पिता बन चुका है।
कभी-कभी वह अपनी माँ से धीमे स्वर में कहता है —
“माँ… बचपन में तो तुम पावर और पोज़िशन के कारण हमें समय नहीं दे सकीं,
अब तो आ जाओ… अब तो हमारे पास बैठो…”
परन्तु शायद वर्षों से बनी आदतें और पद की दुनिया इतनी मजबूत हो चुकी हैं कि माँ आज भी लौट नहीं पा रही।
सफलता उसके पास है…
पर बचपन वापस नहीं है।
दूसरी कहानी
एक और माँ की कहानी है।
उसने भी जीवन में अपनी पहचान और पद को प्राथमिकता दी।
नौकरी और सामाजिक स्थान की मजबूरियों ने उसे ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया कि परिवार दो हिस्सों में बंट गया।
पति — एक प्रसिद्ध और सम्मानित चिकित्सक।
घर — सम्पन्न और सुरक्षित।
फिर भी परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि वह अपने छोटे बेटे को लेकर अलग रहने लगी।
आज स्थिति यह है कि —
छोटा बेटा माँ के साथ है,
और बड़ा बेटा पिता के साथ।
एक ही परिवार…
दो घरों में बँट गया।
दीवारें अलग हुईं तो केवल मकान नहीं बँटे —
रिश्तों की गर्माहट भी कहीं खो गई।
एक मौन प्रश्न
इन दोनों कहानियों में कोई दोषी नहीं है —
न माँ, न परिस्थितियाँ।
पर एक प्रश्न अवश्य खड़ा होता है —
क्या कभी-कभी पावर और पोज़िशन की दौड़ में हम अनजाने में उन रिश्तों को पीछे छोड़ देते हैं, जिनके लिए यह सब प्राप्त करना चाहते थे?
क्योंकि अंततः —
पद से सम्मान मिल सकता है,
पर अपनापन केवल रिश्तों से मिलता है।
और जीवन के अंतिम पड़ाव पर
अक्सर “पोज़िशन” नहीं,
परिवार ही साथ बैठा दिखाई देता है।
