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राम कथा

राम कथा

जय श्री राम।।

क्या कारण था?, जो कि, माता कैकई ने, राम जी को 14 वर्ष का वनवास दिया?। 14 वर्ष से कम, या अधिक का क्यों नहीं दिया?। राम वनवास यह स्वयं रामजी का संकल्प था। राम जी अपने वनवास काल में, अनेक उद्देश्यों को पूरा करना चाहते थे। देवताओं को वरदान दिया था कि, मैं अवतार लेकर राक्षसों का वध करूंगा।

दूसरा कारण यह था। वह जानते थे, मेघनाथ को यह वरदान है, उसने तपस्या करके यह वरदान प्राप्त किया है कि, उसे केवल वह मार सकता है। जो विवाहित हों ।और जिसने 14 वर्ष तक, निद्रा, अन्न ,और नारी, का चिंतन व भोग ना किया हो।

और यह कार्य केवल लक्ष्मण जी कर सकते हैं। रामजी जानते थे लक्ष्मण मेरे साथ बन में अवश्य जाएंगे। और मेघनाथ को इनके अतिरिक्त दूसरा कोई मार नहीं सकता है। निद्रा, नारी, और अन्न का त्याग केवल लक्ष्मण जी कर सकते हैं। और लक्ष्मण जी ने किया भी है। शास्त्रों में इसका वर्णन है।

तीसरा कारण नारद जी का श्राप भी शिरोधार्य कर रखा था। नारी वियोग में उसे भी पूरा करना था।

भगवान शिव विधि के विधान को बदल सकते हैं। ब्रह्मा जी के लिखे हुए लेख को, प्रारब्ध को, बदलने में भगवान शिव सक्षम है।

किंतु, यदि संकल्प स्वयं भगवान का है तो, इसे भगवान शिव भी नहीं बदल सकते हैं। यदि बदल सकते, तो क्या महाराजा दशरथ की प्रार्थना स्वीकार नहीं कर लेते?। भगवान शिव तो राम जी को अपना इष्ट मानते हैं। जिन राम जी के प्रति उनके हृदय में इतना सम्मान है, इतना आदर है,, क्या उन राम जी के पिता श्री की यह विनती स्वीकार नहीं करते?। दशरथ जी ने प्रार्थना की थी भगवान शिव से,। हे भगवान शिव कुछ ऐसा करो कि रामजी वन को ना जाए।

सुमिरि महेसहू कहइ निहोरी।
विनती सुनुहु सदाशिव मोरी।।

किंतु भगवान शिव इस प्रारब्ध रचना को बदलने में सक्षम नहीं थे। इस विषय में भगवान शिव राजा दशरथ जी को जरा भी संतुष्ट नहीं करा पाये।समुद्र से अमृत और विष दोनों निकले थे। अमृत का पान देवताओं ने किया था। और विष का पान भगवान शिव ने किया था। जिन देवताओं ने अमृत पिया वह देव हो गए। और जिस ने विष पिया वह महादेव हो गया। अमृत पीकर तो कोई भी अमर हो सकता है। किंतु विष पीकर जो अमर हो जाए, वास्तव में वही वास्तविक अमरता है। देवताओं के हित के लिए भगवान शिव ने विषपान किया था। और जन कल्याण के लिए माता कैकई ने राम जी को वनवास देकर अपयश लिया। और राम जी के चरित्र को जन-जन तक पहुंचाया। रामजी जानते थे माता कैकेई मुझे माता कौशल्या से भी अधिक चाहती हैं। इसलिए उन्होंने यह दायित्व माता कैकई को निभाने के लिए दिया। माता सरस्वती के हृदय में भी मंथरा की बुद्धि बदलने का आदेश राम जी के द्वारा ही हुआ था। माता कैकई की महिमा कम नहीं है। राम जी को वनवास देकर राम रूपी अमृत को हम जन-जन तक पहुंचाया है। तुलसीदास जी ने इसका वर्णन भी किया है। कि जो माता कैकई को दोषी मानेगा, वह कोई अभागा ही होगा। राजा दशरथ केकई जी के द्वारा मांगे गए वरदान को सुनकर, मूर्छित हो गए। प्रातः काल मंत्री सुमंत ने देखा कि महाराज अभी तक जागे नहीं हैं। क्या कारण है? जाकर देखा,। माता कैकई ने सुमंत से कहा जाकर राम जी को बुला लाओ। सुमंत ने जाकर राम जी को सारा हाल बताया ।राम जी अति शीघ्र चलकर राज महल में आए।

 

यह प्रसंग अगले पोस्ट में जय श्री राम।।

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