सती अनुसूया माता जयंती आज
सती अनुसूया माता जयंती आज
*****************************
हिंदू पंचांग के अनुसार, सती अनुसूया जयंती वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। यह तिथि इस बार 6 अप्रैल 2026 दिन सोमवार को पड़ रही हैं। माता अनुसूया को पतिव्रता धर्म, त्याग और तपस्या का प्रतीक माना जाता है। इस दिन महिलाएं अखंड सौभाग्य, संतान की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं और माता अनुसूया की पूजा करती हैं।
कब है अनुसुया जयंती 2026?
============================
सती अनुसुया जयंती प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। 6 अप्रैल को माता अनुसूया का जन्मोत्सव मनाया जाएगा ।
त्रिदेवों की माता बनने की अद्भुत कथा
=================================
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सती अनुसुइया के पतिव्रत धर्म की चर्चा तीनों लोकों में होने लगी। जब देवर्षि नारद ने बैकुंठ, कैलाश और ब्रह्मलोक में जाकर अनुसुया के सतीत्व की प्रशंसा की, तो माता लक्ष्मी, माता पार्वती और माता सरस्वती के मन में ईर्ष्या (परीक्षा लेने का भाव) जागृत हुई।
माता हठ और त्रिदेवों की परीक्षा
===========================
तीनों देवियों के अनुरोध पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश पृथ्वी लोक पर महर्षि अत्रि के आश्रम पहुँचे। उस समय महर्षि अत्रि आश्रम में नहीं थे। त्रिदेवों ने साधु का वेष धारण किया और माता अनुसुया से भिक्षा मांगी। लेकिन उन्होंने एक कठिन शर्त रख दी:
“हे देवी! हम भिक्षा तभी स्वीकार करेंगे जब आप पूर्णतः निर्वस्त्र होकर हमें भोजन कराएंगी।”
सतीत्व का चमत्कार
===================
माता अनुसुया धर्मसंकट में पड़ गईं। बिना वस्त्र के भिक्षा देना मर्यादा के विरुद्ध था और अतिथि को खाली हाथ लौटाना पाप था। उन्होंने अपने पति का स्मरण किया और मन ही मन कहा— “यदि मेरा पतिव्रत धर्म सत्य है, तो ये तीनों अतिथि अबोध बालक बन जाएं।”
क्षण भर में ही जगत के स्वामी ब्रह्मा, विष्णु और महेश पालने में लेटे हुए छोटे-छोटे शिशु बन गए। माता अनुसुया ने ममता के साथ उन्हें गोद में लिया, स्तनपान कराया और पालने में झुलाने लगीं।
देवियों का पश्चाताप
==================
जब बहुत समय तक त्रिदेव वापस नहीं लौटे, तो तीनों देवियां चिंतित होकर आश्रम पहुँचीं। वहां उन्होंने अपने स्वामियों को बाल रूप में देखा। देवियों ने माता अनुसुइया से क्षमा मांगी और अपने स्वामियों को पुनः मूल रूप में लाने की विनती की।
वरदान और त्रिदेवों का अंश
========================
माता अनुसुइया ने प्रसन्न होकर त्रिदेवों को उनके वास्तविक स्वरूप में लौटा दिया। तब प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे।
• ब्रह्मा जी के अंश से ‘चंद्रमा’ का जन्म हुआ।
• विष्णु जी के अंश से ‘दत्तात्रेय’ का जन्म हुआ।
• शिव जी के अंश से ‘दुर्वासा ऋषि’ का जन्म हुआ।
इसी कारण माता अनुसुइया को ‘त्रिदेवों की माता’ होने का गौरव प्राप्त है।
इन्हें क्यों दिया जाता है सर्वोच्च दर्जा?
================================
हिंदू धर्म में अनुसुइया का स्थान सर्वोच्च है क्योंकि उन्होंने सिद्ध किया कि भक्ति और सतीत्व की शक्ति ईश्वर की शक्ति के समानांतर हो सकती है।
• मर्यादा की मिसाल: उन्होंने अपनी बुद्धि से धर्म और मर्यादा दोनों की रक्षा की।
• सृष्टि का आधार: उन्होंने दिखाया कि एक स्त्री में ‘मां’ का भाव इतना प्रबल होता है कि वह ईश्वर को भी पुत्र की तरह स्नेह दे सकती है।
• अकाल का निवारण: कहा जाता है कि एक बार जब 10 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, तब माता अनुसुइया ने अपनी तपस्या के बल पर फल-फूल उत्पन्न किए और गंगा की धारा (मंदाकिनी) को धरती पर उतारा।
सती अनुसुइया का जीवन हमें सिखाता है कि मानसिक पवित्रता और अपने धर्म के प्रति अटूट निष्ठा से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। उनकी जयंती केवल एक तिथि नहीं, बल्कि नारी शक्ति और मातृत्व के सम्मान का दिन है।
राजेन्द्र गुप्ता,
ज्योतिषी और हस्तरेखाविद
