श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं श्रीकालिकाष्टकम् (सानुवाद सहित)
श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं श्रीकालिकाष्टकम् (सानुवाद सहित)
🕉 परिचय
श्रीकालिकाष्टकम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक महान स्तोत्र है, जिसमें माँ काली के विविध अद्भुत और रहस्यमयी स्वरूपों का वर्णन किया गया है। इसमें ध्यान, स्तुति, और फलश्रुति सभी का समावेश है। भक्त यदि श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करें तो उन्हें सिद्धि, कल्याण और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
ध्यानम्
श्लोक 1
गलद् रक्तमण्डावलीकण्ठमाला महाघोररावा सुदंष्ट्रा कराला ।
विवस्त्रा श्मशानलया मुक्तकेशी महाकालकामाकुला कालिकेयम् ॥१॥
भावार्थ
माँ काली गले में रक्त टपकते मुण्डों की माला पहने हुए हैं, उनके मुख से भयानक शब्द निकलते हैं। वे दंष्ट्राओं से शोभायमान, वस्त्ररहित, श्मशानवासी, बिखरे केशों वाली और महाकाल के साथ लीला में संलग्न हैं।
श्लोक 2
भुजे वामयुग्मे शिरोऽसिं दधाना वरं दक्षयुग्मेऽभयं वै तथैव ।
सुमध्याऽपि तुङ्गस्तनाभारनम्रा लसद् रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या ॥२॥
भावार्थ
माँ काली बाएँ हाथ में खड्ग और नरमुण्ड तथा दाएँ हाथों में वर व अभय मुद्रा धारण करती हैं। वे मधुर कटि से युक्त, उन्नत स्तनों से झुकी हुई और लाल अधरों व मधुर मुस्कान से शोभायमान हैं।
श्लोक 3
शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशी लसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककाञ्ची ।
शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभिः चर्दिक्षुशब्दायमानाsभिरेजे ॥३॥
भावार्थ
माँ काली के कानों में शवों के आभूषण हैं, कमर में शव-माला है, वे शवों से बने आसन पर विराजमान हैं और चारों ओर से सियारिनों के भयानक स्वर गूंजते हैं।
स्तुति (श्लोक 4–10)
इन श्लोकों में माँ काली के अद्भुत स्वरूप का वर्णन है, जिन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी पूर्ण रूप से नहीं जान सकते।
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वे जगन्मोहिनी हैं।
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वे स्वर्गदात्री और कल्पवल्ली समान हैं।
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वे भक्तवत्सला होकर हमेशा शुद्ध हृदय में प्रकट होती हैं।
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उनका स्वरूप चिदानन्दघन और योगमाया है।
फलश्रुति (श्लोक 11)
यदि कोई साधक ध्यानपूर्वक श्रीकालिकाष्टक का पाठ करता है तो –
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उसे आठों सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
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गृह में सुख-समृद्धि रहती है।
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मृत्यु के उपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शंकराचार्यकृत यह श्रीकालिकाष्टकम् माँ काली की अनंत महिमा का वर्णन करता है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि साधक को सिद्धि और मोक्ष की ओर ले जाने वाला आध्यात्मिक मार्ग है।
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