जीवन का सूत्र : “तीन P का रहस्य”
जीवन का सूत्र : “तीन P का रहस्य”
आज प्रातः मेरी बातचीत प्रोफेसर डॉ. विकास जैन जी से हो रही थी। मैं उन्हें पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से जानता हूँ। चर्चा के दौरान उन्होंने अपने जीवन अनुभवों से जुड़ा एक अत्यंत गहन और व्यावहारिक सिद्धांत साझा किया, जिसे उन्होंने “तीन P का सिद्धांत” कहा।
उनके अनुसार जीवन में व्यक्ति की सफलता और पहचान मुख्यतः तीन आधारों पर टिकी होती है —
1. P – पैसा (Money)
2. P – पावर (Power)
3. P – प्लेस / प्रतिष्ठा (Position or Place)
डॉ. जैन जी का मानना है कि संसार में बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिन्हें ये तीनों एक साथ और स्थायी रूप से प्राप्त हो सकें।
सामान्यतः देखा जाता है कि —
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किसी व्यक्ति के पास पैसा तो होता है, पर प्रभाव या प्रतिष्ठित स्थान का अभाव रहता है।
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कुछ लोगों को पैसा और पावर दोनों प्राप्त हो जाते हैं, किंतु स्थायी सम्मान या उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिल पाती।
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जिनके पास प्रतिष्ठित पद या स्थान होता है, वे प्रायः आर्थिक सम्पन्नता या वास्तविक शक्ति से दूर रहते हैं।
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वहीं जिनके पास पावर होती है, उनके जीवन में धन या स्थायी प्रतिष्ठा का संतुलन सदैव बना रहे — यह आवश्यक नहीं।
उन्होंने एक महत्वपूर्ण तथ्य और बताया कि कभी-कभी जीवन के किसी विशेष कालखंड में कुछ व्यक्तियों को ये तीनों प्राप्त होते हुए प्रतीत होते हैं, किंतु समय के साथ उनमें से एक पक्ष अत्यंत मजबूत रह जाता है और शेष दो धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं।
एक प्रेरणादायक वास्तविक उदाहरण
भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी का जीवन इस सिद्धांत को अत्यंत सुंदर रूप से स्पष्ट करता है।
डॉ. कलाम जी ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद — राष्ट्रपति पद — को सुशोभित किया। उनके पास राष्ट्र स्तर की प्रतिष्ठा (Place) और नैतिक प्रभाव एवं शक्ति (Power) दोनों थे। फिर भी उन्होंने व्यक्तिगत धन-संपत्ति या भौतिक वैभव को कभी महत्व नहीं दिया। जीवन भर सादगी, ज्ञान और राष्ट्रसेवा को ही अपना उद्देश्य बनाए रखा।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची महानता तीनों P को संग्रहित करने में नहीं, बल्कि प्राप्त शक्ति और प्रतिष्ठा का उपयोग समाज एवं राष्ट्र के कल्याण हेतु करने में है।
जीवन का वास्तविक सत्य यह है कि —
हर व्यक्ति को सब कुछ एक साथ मिलना आवश्यक नहीं होता।
सफलता का माप केवल पैसा, पावर और प्लेस नहीं, बल्कि उनका संतुलित एवं सार्थक उपयोग है।
अंततः —
स्थायी सम्मान और संतोष बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि चरित्र, सेवा और जीवन मूल्यों से प्राप्त होता है।
लेखक
रविन्द्र जायसवाल
द्वारिकाधीश डिवाइनमार्ट
मथुरा
