क्या प्राचीन ऋषियों को समानांतर ब्रह्माण्डों का ज्ञान था?
क्या प्राचीन ऋषियों को समानांतर ब्रह्माण्डों (Parallel Universes) का ज्ञान था?
आज भले ही वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड की गहराइयों में समय और स्थान के रहस्यों को सुलझाने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन क्या यह संभव है कि हजारों साल पहले हमारे ऋषि-मुनि इन रहस्यों को पहले ही जान चुके थे?
आधुनिक विज्ञान में आइंस्टीन के “सापेक्षता के सिद्धांत” (Theory of Relativity) ने समय और स्थान को एक-साथ जोड़कर नई दिशा दी। उनके साथ-साथ मैक्स प्लांक, श्रोडिंगर और पॉल डिराक जैसे वैज्ञानिकों ने ब्रह्माण्ड की जटिलता को समझने की कोशिश की। वहीं जेनेवा के Large Hadron Collider जैसे प्रयोग यह संकेत दे रहे हैं कि शायद अनेक ब्रह्माण्ड (Multiple Universes) वास्तव में अस्तित्व में हैं।
परंतु यह सोच तब और गहराती है जब योगवशिष्ठ जैसे ग्रंथों को पढ़ते हैं, जहाँ एक नहीं, बल्कि कई ब्रह्माण्डों और चेतना की यात्रा का स्पष्ट वर्णन मिलता है। विशेष रूप से राजा पद्म और रानी लीला की कथा हमें चौंकाती है, जहाँ लीला मानसिक यात्रा से न केवल दूसरे लोक में प्रवेश करती हैं, बल्कि समय और स्थान के भिन्न आयामों को भी अनुभव करती हैं।
इस कथानक में सरस्वती देवी का संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है —
“जिस प्रकार केले के तने में एक के भीतर अनेक परतें होती हैं, उसी प्रकार इस जगत में अनेक सृष्टियाँ एक के भीतर विद्यमान हैं।”
लीला द्वारा अपने ही पति के पिछले और भावी जन्मों को देखना, और उनके पुनः एक ही शरीर में लौट आना, यह संकेत करता है कि चेतना समय और शरीर से परे जा सकती है।
आधुनिक भौतिकी जिस Parallel Universe की बात करती है, क्या वही बात हमारे ग्रंथों में पहले ही नहीं कही गई है?
यह विचारणीय है कि आज जब वैज्ञानिक Time Dilation, Multiverse और Quantum Entanglement जैसे सिद्धांतों पर काम कर रहे हैं, वही बातें हमारे योगियों और ऋषियों ने ध्यान और साधना द्वारा अनुभव की थी।
तो प्रश्न उठता है:
क्या हमें अपने ऋषि-मुनियों के ज्ञान को केवल पौराणिक कहानियों के रूप में देखना चाहिए, या फिर उन्हें एक गहरे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से फिर से पढ़ने की जरूरत है?
यह समय है जब हमें अपने ग्रंथों को नए दृष्टिकोण से समझना चाहिए। हो सकता है कि वहाँ छिपे रहस्य ही आने वाले विज्ञान की अगली क्रांति की कुंजी बनें।
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