स्वस्तिक क्यों बनाया जाता है
स्वास्तिक मंत्र :
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो ब्रिहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
“महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करो, विश्व के ज्ञानस्वरूप पूषादेव हमारा कल्याण करो। जिसका हथियार अटूट है ऐसे गरुड़ भगवान हमारा मंगल करो। बृहस्पति हमारा मंगल करो।”
स्वस्तिक का अर्थ :
स्वस्तिक का चिन्ह मंगल कामना का प्रतीक होने के अलावा भी कई प्रकार के अर्थ और सन्देश देता है। स्वस्तिक की रेखाओं का समकोण पर मिलना जीवन में संतुलन बनाये रखने का सन्देश है। संतुलन के बिना मानसिक और शरीरिक विकार उत्पन्न हो जाते हैं जो समाज के लिए सही नहीं हैं। स्वस्तिक सनातन धर्म का एक सांकेतिक चिन्ह है जिसमें लम्बी और आड़ी रेखा समकोण पर मिला कर एक विशेष तरीके से और आगे बढ़ाई जाती हैं। इसके चारों कोनो में बिंदु लगाए जाते हैं। इस चिन्ह को परमात्मा स्वरुप तथा अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है। विश्व भर में इससे मिलते जुलते चिन्ह हजारों वर्ष पहले से उपयोग में लाये जाते रहे हैं।
स्वस्तिक की चार रेखाएं इन्हें भी इंगित करती हैं :
- ब्रह्मा के चार मुख
- चार वेद – ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद , अथर्ववेद
- चार आश्रम – ब्रहचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थान तथा सन्यास आश्रम
- चार युग – सतयुग , त्रेतायुग , द्वापरयुग और कलियुग
- चार वर्ण – ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शुद्र
- चार पुरषार्थ – धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष
4 पुरूर्षाथः 1. धर्म 2. अर्थ 3. काम 4. मोक्ष
4 मुक्तिः
1. सालोक्य – जीव भगवान के साथ उनके लोक में ही वास करता हैं।
- सामीप्य- जीव भगवान के सन्निध्य में रहते कामनाएं भोगता हैं।
- सारूप्य – जीव भगवान के साम्य (जैसे चतुर्भुज) रूप लिए इच्छाएं अनुभूत करता हैं।
- सायुज्य – भक्त भगवान मे लीन होकर आनंद की अनुभूति करता हैं।
4 अंतःकरणः 1. मन 2. अहंकार 3.बुद्धि 4. चित
4 भक्तो के प्रकारः 1. श्रृद्धा 2. विष्वास 3. प्रेम 4. समर्पण
स्वस्तिक का भगवत स्वरुप
- स्वस्तिक को भगवान् विष्णु का स्वरुप माना जाता है जिमसे चार भुजाएं विष्णु की चार भुजाएँ मानी जाती है।
- मध्य का केंद्र बिंदु विष्णु का नाभि स्थल है जहाँ से कमल उत्पन्न होता है, जिस पर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी सुशोभित होते हैं।
- विष्णु पुराण में स्वस्तिक को सुदर्शन चक्र का प्रतीक माना जाता है।
- स्वस्तिक को भगवान शिव का स्वरुप भी माना जाता है जिसमें खड़ी रेखा को ज्योतिर्लिंग के रूप में देखा जाता है जिसका न कोई आदि ही न अंत
- तथा आड़ी रेखा सृष्टि का विस्तार दर्शाता है। इसे लिंग रूप में निरंतर सृजन और विकास की मूल प्रेरणा समझा जाता है।
- स्वस्तिक को धन सम्पदा की देवी लक्ष्मी जी का प्रतीक चिन्ह भी कहा गया है, इसलिए जहाँ भी भगवती लक्ष्मी की पूजा आराधना होती है, वहां स्वस्तिक अवश्य अंकित किया जाता है। यदि देवी की मूर्ति या चित्र न हो तो लाल रंग से स्वस्तिक बना कर उसकी पूजा देवी के रूप में की जाती है।
- स्वस्तिक कोगणेश जी का स्वरुप भी मानते हैं। माना जाता है कि स्वस्तिक में गणेश जैसी ही विध्न नष्ट करने और अमंगल दूर भगाने की शक्ति निहित होती है।
- स्वस्तिक को अनादी , अनंत और अविनाशी ब्रह्मा की संज्ञा भी दी जाती है।
स्वास्तिक का इतिहास क्या है?
वैदिक ऋषि ने अपने आध्यात्मिक अनुभव के आधार पर कुछ विशेष चिन्हों मंगल भाव को प्रकट करने वाले और जीवन में खुशियां भरने वाले इन चिन्हों में से एक है। स्वास्तिक, उन्होंने स्वास्तिक चिन्ह के रहस्य को वास्तविक उजागर किया और इसके धार्मिक ज्योतिष और वास्तु के महत्व को बताया आज स्वास्तिक को प्रत्येक धर्म और संस्कृति में अलग-अलग रूपों में इस्तेमाल किया जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में ऐसी चिन्ह और अवशेष प्राप्त हुए हैं जिससे यह प्रमाणित होता है। कि कई हजार वर्ष पूर्व मानव सभ्यता अपने भवनों में इस मंगल कार्य चिन्ह का प्रयोग किया करती थी सिंधु घाटी से प्राप्त मुद्रा और और बर्तनों में स्वास्तिक का चिन्ह खुदा हुआ मिला उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाओं में भी स्वास्तिक के चिन्ह मिले हैं ऐतिहासिक साक्ष्यों में स्वास्तिक का महत्व भरा पड़ा है। मोहनजोदड़ो हड़प्पा संस्कृति अशोक के शिलालेखों रामायण, हरिवंश पुराण, महाभारत आदि में स्वास्तिक का अनेकों बार उल्लेख मिलता है।
किसी भी शुभ कार्य का आरंभ करने के पहले हिंदू धर्म में स्वास्तिक का चिन्ह ने बनाकर उसकी पूजा करने का महत्व है। मान्यता है। कि ऐसा करने से सभी कार्य सफल होते हैं स्वास्तिक के चिन्ह को मंगल का प्रतीक माना गया है। स्वास्तिक शब्द को सू और अस्ति का मिश्रण योग माना जाता है। यहां शु का अर्थ है। शुभ और अस्थि से तात्पर्य है। होना अर्थात स्वास्तिक का मौलिक अर्थ है।
हिन्दू धर्म ही नहीं हर सभ्यता में मौजूद है स्वास्तिक… जानिए क्यों हिटलर को प्रिय था ये चिन्ह
इस प्रतीक की खास बात ये है कि ये सबसे पवित्र प्रतीकों में से एक है और साथ साथ इसके प्रतीक के इतिहास के साथ लाखों लोगों की दुर्दांत हत्या और अत्याचार की कहानी भी जुड़ी है. आखिर कुछ तो खास बात थी स्वास्तिक चिन्ह में जो अडोल्फ़ हिटलर ने इसे अपना चिन्ह बनाया।
हिन्दू सभ्यता और हिटलर के अलावा स्वास्तिक चिन्ह का उपयोग दुनिया की लगभग हर प्राचीन सभ्यता में मिलता है. बौद्ध, ग्रीक,रोमन,ईसाई,मध्ययुगीन हर काल और समय में इस प्रतीक चिन्ह को देखा गया है. स्थान और सभ्यता के अनुसार स्वास्तिक का नाम भी अलग अलग होता रहता है.
इतिहासकारों के अनुसार स्वास्तिक
चिन्ह दो प्रकार का होता है. सकारात्मक और नकारात्मक .सकारात्मक स्वास्तिक ऊपर की ओर होता है और नकारात्मक स्वास्तिक की भुजाएं नीचे की ओर होती है. प्राचीन सभ्यताओं के बारे में अध्ययन करने पर पता चलता है कि सबसे पहले स्वास्तिक चिन्ह उक्रेन में उपयोग किया गया था. सकारात्मक स्वास्तिक का अर्थ शुद्धता और शुभ होता है, लेकिन इस चिन्ह का असली अर्थ होता है स्थायी विजय. शायद यही कारण था कि हिटलर ने अपनी नाज़ी पार्टी के लिए इस प्रतीक चिन्ह को चुना था. हिन्दू धर्म के अनुसार भी दक्षिणमुखी स्वास्तिक विष्णु का प्रतीक है और वाममुखी स्वास्तिक काली का प्रतीक.
स्वस्तिक क्यों बनाया जाता है
- स्वस्तिक दो शब्दों से बना है – सु + अस्ति. इसका अर्थ है – शुभ हो अर्थात मंगलमय, कल्याणमय और सुशोभित अस्तित्व हो। यह शाश्वत जीवन और अक्षय मंगल को प्रगट करता है।
- स्वस्तिक सभी के लिए शुभ, मंगल तथा कल्याण भावना को दर्शाता है। इसे सुख समृद्धि तथा परमात्मा का प्रतीक माना जाता है। अतः शुभ कार्य में सबसे पहले स्वस्तिक बनाया जाता है।
- इसके अलावा यह चारों दिशाओं के अधिपति – पूर्व के इंद्र, पश्चिम के वरुण, उत्तर के कुबेर तथा दक्षिण दिशा के यमराज के अभय एवं आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए बनाया जाता है।
- ज्योतिष शास्त्र में स्वस्तिक को प्रतिष्ठा, सफलता और उन्नति का प्रतीक माना गया है। इसका प्रयोग धनवृद्धि , गृहशान्ति, वास्तुदोष निवारण, भौतिक कामनाओं की पूर्ति, तनाव, अनिद्रा, क्लेश, निर्धनता से मुक्ति आदि के लिए भी किया जाता है ।
- आर्य समाज के अनुसार स्वस्तिक का चिन्ह ब्राह्मी लिपि में लिखा गया ॐ है। जैन धर्म में इसी सातवे तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ तथा अष्टमंगल के प्रतीक के रूप में माना जाता है। भगवान बुद्ध के शरीर पर स्वस्तिक चिन्ह होता है।
- स्वस्तिक नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है तथा पोजिटिव एनेर्जी में वृद्धि करता है जिसे वैज्ञानिक तौर पर भी स्वीकार किया गया है।
स्वस्तिक कब और कहाँ बनाया जाता है
स्वस्तिक को बहुत मंगलकारी माना जाता है अतः सभी मांगलिक कार्यों में सबसे पहले इसे स्थापित किया जाता है। इन जगहों पर स्वस्तिक अवश्य बनाया जाता है –
- किसी भी प्रकार की पूजा में पाटे या चौकी आदि पर।
- पूजा में रखे गए जल कलश पर।
- नए घड़े में जल भरने से पहले उस पर।
- गृह प्रवेश के समय या नववधू के आगमन के समय मुख्य द्वार के दोनों तरफ।
- विभिन्न पर्व और त्यौहार के समय भित्ति चित्रों में।
- दीपावली के त्यौहार के समय रंगोली तथा बाँधनवार में।
- व्यापार के बही खाता पूजन में।
- तिजोरी , गल्ला या अलमारी में।
- ऑफिस , दुकान , फैक्ट्री आदि के मुख्य द्वार पर।
- नवजात शिशु के छठे दिन के उत्सव तथा मुंडन संस्कार के बाद।
- विवाह के समय पूजा वेदी पर वर वधु के मंगल संग की भावना के लिए।
स्वस्तिक कहाँ नहीं बनाना चाहिए
स्वस्तिक का प्रयोग अशुद्ध, अपवित्र और अनुचित स्थानों पर नहीं करना चाहिए । कहा जाता कि स्वस्तिक के अपमान व गलत प्रयोग करने से बुद्धि एवं विवेक समाप्त होकर दरिद्रता, तनाव, रोग तथा क्लेश आदि में वृद्धि होती है।दाहिनी ओर मुड़ने वाली भुजाओं वाला स्वस्तिक दक्षिणावर्त स्वस्तिक बाईं तरफ मुड़ने वाली भुजाओं वाला वामावर्त स्वस्तिक कहलाता है। वामावर्त स्वस्तिक उल्टा होता है जिसे अमांगलिक और हानिकारक माना जाता है, अतः ऐसा स्वस्तिक नहीं बनाना चाहिए।
स्वातिक निर्मित करने की उचित विधि
- स्वस्तिक का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे उचित रूप से निर्मित करना आवश्यक है।
- स्वास्तिक का निर्माण करने के लिए बाल्य काल मे नव बिंदु बना कर अभ्यास कराया गया था।(ये नव बिंदु नव ग्रह का प्रतीक बताये गए थे)
- इन नव बिन्दुओ को इस प्रकार संयुक्त किया कि वो एक दूसरे को काट देने वाली रेखा ना हो, निरन्तर अभ्यास से ये निर्मित करना सरल होगा।
- सर्वप्रथम स्वास्तिक का दांया भाग निर्मित करें उसके उपरांत बाएं भाग को निर्मित कीजिये।
- इसे निर्मित करने के लिए हिंदी भाषा के अक्षर ग को और म को स्मरण रखिये इस से ही गम या गं को निर्मित करते हैं।
- माना जाता है हल्दी से स्वास्तिक बनाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ता है, और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद भी मिलता है. स्वास्तिक का चिन्ह बनाते समय ध्यान रखना चाहिए, कि ये9 उंगली लंबा और चौड़ा हो.
स्वस्तिक चिन्ह में बिंदुओं का महत्व
स्वस्तिक की खड़ी रेखा सृष्टि के उत्पत्ति का प्रतिक है। और आड़ी रेखा सृष्टि के विस्तार का प्रतिक है। तथा स्वस्तिक का मध्य बिंदु विष्णु जी का नाभि कमल माना जाता है। जहाँ से विश्व की उत्पत्ति हुई है।. स्वस्तिक में प्रयोग होने वाले 4 बिन्दुओ को 4 दिशाओं का प्रतिक माना जाता है।।।
कुछ विद्वान् इसे गणेश जी का प्रतिक मानकर प्रथम पूज्य मानते हैं. कुछ लोग इनकी 4 वर्णों की एकता का प्रतिक मानते है।, कुछ इसे ब्रह्माण्ड का प्रतिक मानते है। , कुछ इसे इश्वर का प्रतिक मानते है।।
स्वस्तिक का रंग व ऊर्जा
स्वस्तिक की आकृति सदैव कुमकुम (कुंकुम), सिन्दूर व अष्टगंध से ही अंकित करनी चाहिए। यदि आधुनिक दृ्ष्टिकोण से देखा जाए तो अब तो विज्ञान भी स्वस्तिक, इत्यादि माँगलिक चिह्नों की महता स्वीकार करने लगा है।। आधुनिक विज्ञान ने वातावरण तथा किसी भी जीवित वस्तु,पदार्थ इत्यादि के ऊर्जा को मापने के लिए विभिन्न उपकरणों का आविष्कार किया है। और इस ऊर्जा मापने की इकाई को नाम दिया है।- बोविस।
इस यंत्र का आविष्कार जर्मनी और फ़्राँस ने किया है।। मृत मानव शरीर का बोविस शून्य माना गया है। और मानव में औसत ऊर्जा क्षेत्र 6,500 बोविस पाया गया है।। वैज्ञानिक हार्टमेण्ट अनसर्ट ने आवेएंटिना नामक यन्त्र द्वारा ‘विधिवत पूर्ण लाल कुंकुम से अंकित स्वस्तिक की सकारात्मक ऊर्जा को 100000 बोविस यूनिट’ में नापा है।। यदि इसे उल्टा बना दिया जाए तो यह प्रतिकूल ऊर्जा को इसी अनुपात में बढ़ाता है।।
स्वस्तिक के ये उपाय करने से घर में सदैव बरकत व सकारात्मक ऊर्जा का होगा वास
स्वस्तिक अत्यंत प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है।। इसलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्न अंकित करके उसका पूजन किया जाता है।। गणेश पुराण के अनुसार स्वस्तिक भगवान गणेश का स्वरूप है।। इसमें सभी बाधा अौर अमंगल को दूर करने की शक्ति निहित है।। स्वस्तिक को देवी लक्ष्मी अर्थात श्री का प्रतीक माना जाता है।। ज्योतिष में स्वस्तिक के कुछ अलग प्रयोग बताए गए हैं। जिन्हें करने से घर में सदैव बरकत अौर सकारात्मक ऊर्जा का वास होगा।
वैसे तो हिंदू धर्म में स्वास्तिक का प्रयोग सबसे उच्च माना गया है। लेकिन हिंदू धर्म से भी ऊपर स्वास्तिक ने यदि कहीं मान्यता हासिल की है। तो वह है। जैन धर्म हिंदू धर्म से भी ज्यादा मान्यता स्वास्तिक का जैन धर्म है। जैन धर्म में यह सातवीं जैन का प्रतीक है। जिसे सब तीर्थंकर सुपारस नाथ के नाम से जानती है। श्वेतांबर जैनी स्वास्तिक को अष्टमंगल का मुख्य प्रतीक मानते हैं सिंधु घाटी की खुदाई के दौरान स्वास्तिक प्रतीक चिन्ह मिला है। ऐसा माना जाता है। कि हड़प्पा सभ्यता के लोग भी सूर्य पूजा को महत्व देते थे हड़प्पा सभ्यता के लोग का व्यापार संबंध ईरान से भी था
