भारतीय रसोई के चूल्हे की राख: क्यों आज 650 रुपए किलो बिक रही है?
भारतीय रसोई के चूल्हे की राख: क्यों आज 650 रुपए किलो बिक रही है?
एक समय था जब हैंड सैनिटाइजर और साबुन आम नहीं थे। तब हाथ धोने और सफाई के लिए जो सबसे सर्वसुलभ और प्रभावी वस्तु थी, वह थी – चूल्हे की राख। यह राख लकड़ी और गोबर के कंडों के जलने से प्राप्त होती थी। आज वही राख वैज्ञानिक गुणों के कारण बाजार में 650 रुपये किलो तक बिक रही है।
आइए जानते हैं कि आखिर चूल्हे की राख में ऐसा क्या खास है जो इसे इतना कीमती बनाता है।
चूल्हे की राख का वैज्ञानिक विश्लेषण
चूल्हे की राख में वे सभी मुख्य और सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो सामान्यतः पौधों में भी मिलते हैं। ये तत्व पौधे मिट्टी और वातावरण से ग्रहण करते हैं।
राख में पाए जाने वाले प्रमुख तत्व:
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Calcium (कैल्शियम) – सबसे अधिक मात्रा में
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Potassium (पोटैशियम)
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Aluminium
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Magnesium
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Iron (लोहा)
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Phosphorus
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Manganese
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Sodium
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Nitrogen
सूक्ष्म मात्रा में पाए जाने वाले तत्व:
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Zinc
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Boron
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Copper
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Lead
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Chromium
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Nickel
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Molybdenum
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Arsenic
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Cadmium
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Mercury
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Selenium
राख का pH और उसका कीटाणुनाशक प्रभाव
राख में मौजूद Calcium और Potassium के कारण इसका pH स्तर 9.0 से 13.5 तक होता है, जो इसे अत्यधिक क्षारीय (Alkaline) बनाता है। यही कारण है कि:
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जब हाथ में राख लेकर पानी के साथ रगड़ा जाता है
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तो यह साबुन जैसा प्रभाव पैदा करती है
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और जीवाणु (Bacteria) व विषाणु (Virus) नष्ट हो जाते हैं
यही वजह है कि पुराने समय में लोग साबुन की जगह राख से ही हाथ धोते थे।
सनातन परंपरा और राख का वैज्ञानिक रहस्य
सनातन धर्म में मृत देह को अग्नि को समर्पित करने की परंपरा है। इसमें लकड़ियों और गोबर के उपलों के साथ शरीर का दाह संस्कार किया जाता है। इसके बाद जो राख प्राप्त होती है, उसे:
👉 बहते जल में प्रवाहित किया जाता है
इसका वैज्ञानिक लाभ:
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राख जल में मिलकर प्राकृतिक डिसइंफेक्टेंट का काम करती है
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जल में मौजूद कोलीफॉर्म बैक्टीरिया (MPN) की संख्या कम होती है
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Dissolved Oxygen (DO) की मात्रा बढ़ती है
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जिससे जल शुद्ध होता है
सीवेज वाटर ट्रीटमेंट (STP) में राख का उपयोग
वैज्ञानिक शोधों से यह प्रमाणित हो चुका है कि:
✅ गाय के गोबर से बनी राख एक Eco-Friendly Disinfectant है
✅ इसका उपयोग सीवेज वाटर ट्रीटमेंट (STP) में किया जा सकता है
✅ यह केमिकल्स के मुकाबले सस्ता और पर्यावरण के लिए सुरक्षित विकल्प है
नागा साधु और धूनी की राख का रहस्य
आपने नागा साधुओं को अपने शरीर पर धूनी की राख मलते हुए जरूर देखा होगा। इसके पीछे भी गहरा विज्ञान छिपा है:
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यह शरीर को कीटाणुओं से सुरक्षित रखती है
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त्वचा को शुद्ध करती है
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साथ ही भीषण ठंड से भी रक्षा करती है
चूल्हे की राख केवल बेकार समझी जाने वाली चीज नहीं, बल्कि यह:
✅ एक प्राकृतिक डिसइंफेक्टेंट है
✅ वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कीटाणुनाशक तत्वों से भरपूर है
✅ जल शुद्धिकरण में उपयोगी है
✅ सनातन परंपरा का वैज्ञानिक आधार दर्शाती है
यही कारण है कि आज वही राख बाजार में 650 रुपये किलो जैसे ऊंचे दामों पर बेची जा रही है।
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