भद्रा आज
भद्रा आज
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हिंदू पंचांग और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भद्रा एक विशेष अशुभ समय या करण (विष्टि करण) को कहा जाता है। इस दौरान किसी भी तरह के शुभ, मांगलिक और नए कार्य करना वर्जित माना जाता है।
पौराणिक कथा और परिचय
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा को सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया की पुत्री तथा शनिदेव की बहन माना गया है।
इनका स्वभाव बहुत क्रोधी और उग्र बताया गया है।
इनका जन्म राक्षसों का नाश करने के लिए हुआ था।
भद्रा का वास और प्रभाव
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भद्रा का वास तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) में होता है। चंद्रमा की स्थिति के आधार पर तय होता है कि भद्रा कहाँ है:
पृथ्वी लोक: जब भद्रा पृथ्वी पर होती है, तब इसे सबसे ज्यादा अशुभ माना जाता है। इस दौरान किए गए कार्यों में असफलता या हानि की आशंका रहती है।
स्वर्ग और पाताल लोक: जब भद्रा स्वर्ग या पाताल लोक में होती है, तब इसका पृथ्वी के मनुष्यों पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है।
वर्जित कार्य
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भद्रा काल में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और रक्षाबंधन जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं।
ऐसा माना जाता है कि इस अवधि में किए गए कार्यों में बाधा या रुकावट आती है।
राजेन्द्र गुप्ता,
ज्योतिषी और हस्तरेखाविद
