रेशम का कीड़ा और मनुष्य का मोह
रेशम का कीड़ा और मनुष्य का मोह
हरे-भरे शहतूत के एक वृक्ष पर रेशम के एक छोटे से कीड़े ने जन्म लिया।
वह धीरे-धीरे कोमल पत्तियाँ खाता रहा। जब उसका उदर भर गया, तो उसके भीतर एक नया विचार जन्म लेने लगा—क्यों न अपने चारों ओर एक ऐसा संसार बनाया जाए, जहाँ उसे सुख, सुरक्षा और शांति मिल सके?
उसने अपने ही शरीर से एक चमकीला, महीन और मुलायम रेशमी धागा निकालना शुरू किया।
एक धागा… फिर दूसरा… और फिर लगातार धागे।
वह बड़े आनंद से उस रेशम को अपने चारों ओर लपेटता गया। जैसे-जैसे रेशमी परतें बढ़ती गईं, उसे अपने चारों ओर का संसार और अधिक सुरक्षित, सुंदर और आरामदायक महसूस होने लगा।
वह मन ही मन प्रसन्न होकर सोचने लगा—
“यह मेरा अपना महल है। यहाँ न आँधी का भय है, न धूप की परेशानी और न किसी शिकारी का डर। इससे अधिक सुखद और सुरक्षित जीवन भला क्या हो सकता है?”
सुख और सुरक्षा के इस मोह में वह लगातार रेशम बुनता रहा।
उसे यह एहसास ही नहीं हुआ कि जिस रेशम को वह अपना महल समझ रहा है, वही धीरे-धीरे उसकी कैद बनता जा रहा है।
उसने दीवारें मोटी कीं।
फिर और मोटी।
फिर इतनी घनी कि भीतर से बाहर देखने का रास्ता भी समाप्त हो गया।
अब उसके पास न बाहर निकलने का रास्ता था और न ही पंख फैलाने की जगह।
जिस घर को उसने स्वयं बनाया था, वही उसका कारागार बन चुका था।
कुछ समय बाद एक रेशम व्यापारी वहाँ पहुँचा।
उसने उस सुंदर और चमकीले कोकून को वृक्ष से तोड़ा और रेशम प्राप्त करने के लिए उसे खौलते हुए पानी में डाल दिया।
जिस रेशमी संसार को उस छोटे से जीव ने बड़े प्रेम, परिश्रम और आनंद से बनाया था, उसी संसार के भीतर उसके जीवन का अंत हो गया।
क्या यह कहानी केवल रेशम के कीड़े की है?
शायद नहीं।
यह कहानी हमें अपने जीवन का आईना दिखाती है।
मनुष्य भी कहीं न कहीं उसी रेशम के कीड़े जैसा है।
वह अपने भीतर से ही—
कामना के धागे,
मोह के धागे,
वासना के धागे,
परिग्रह के धागे,
और अहंकार के धागे
निकालकर अपने चारों ओर एक संसार बुनता चला जाता है।
वह घर बनाता है।
धन जोड़ता है।
संपत्ति बढ़ाता है।
प्रतिष्ठा कमाता है।
रिश्तों में अधिकार खोजता है।
और धीरे-धीरे इन सबको अपनी सुरक्षा, सुख और पहचान समझने लगता है।
फिर एक समय ऐसा आता है जब जिस संसार को उसने अपने सुख के लिए बनाया था, उसी संसार से उसका मोह इतना गहरा हो जाता है कि उससे बाहर निकलना कठिन हो जाता है।
असली बंधन बाहर नहीं, भीतर होता है
धन बुरा नहीं है।
घर बुरा नहीं है।
परिवार बुरा नहीं है।
सुविधाएँ बुरी नहीं हैं।
समस्या तब शुरू होती है जब इन वस्तुओं का स्वामित्व हमारे मन पर हो जाता है।
जब वस्तुएँ हमारे पास रहने के बजाय हम वस्तुओं के पास रहने लगते हैं।
जब धन साधन न रहकर जीवन का उद्देश्य बन जाता है।
जब रिश्ते प्रेम के बजाय अधिकार बन जाते हैं।
जब प्रतिष्ठा हमारी पहचान बन जाती है।
और जब “मेरा” इतना बड़ा हो जाता है कि उसमें “मैं” ही कैद हो जाता है।
तब हमारा बनाया हुआ संसार भी उसी रेशमी कोकून की तरह बन जाता है।
बाहर से सुंदर…
अंदर से बंधन।
मृत्यु से पहले समझ लेना जरूरी है
रेशम के कीड़े को अपने बनाए कोकून की सुंदरता पर गर्व था, लेकिन उसे यह पता नहीं था कि यही कोकून उसके जीवन का अंत बन जाएगा।
मनुष्य भी जीवन भर बहुत कुछ जोड़ता रहता है।
लेकिन अंत में उसे सब कुछ यहीं छोड़कर जाना पड़ता है।
न धन साथ जाता है।
न संपत्ति।
न पद।
न प्रतिष्ठा।
न वह शरीर, जिसके सुख के लिए उसने पूरी जिंदगी लगा दी।
फिर प्रश्न यह नहीं है कि हमने जीवन में कितना जोड़ा, बल्कि यह है कि हमने अपने भीतर कितना छोड़ा।
कितना मोह छोड़ा?
कितना अहंकार छोड़ा?
कितनी इच्छाओं पर विजय पाई?
और अपने भीतर कितनी शांति पैदा की?
मुक्ति का रास्ता क्या है?
इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य संसार छोड़कर जंगल चला जाए।
सच्चा त्याग संसार छोड़ना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए आसक्ति को छोड़ना है।
कर्तव्य निभाइए, लेकिन उसमें अहंकार मत जोड़िए।
धन कमाइए, लेकिन धन को अपना स्वामी मत बनने दीजिए।
परिवार से प्रेम कीजिए, लेकिन अधिकार और मोह को प्रेम पर हावी मत होने दीजिए।
सुविधाओं का आनंद लीजिए, लेकिन अपनी खुशी को केवल सुविधाओं पर निर्भर मत कीजिए।
और सबसे महत्वपूर्ण—
अपने भीतर विवेक का दीपक जलाए रखिए।
क्योंकि जिस दिन हमें यह समझ आ जाती है कि यह संसार हमारा स्थायी घर नहीं, बल्कि एक यात्रा है, उसी दिन मोह के धागे धीरे-धीरे ढीले पड़ने लगते हैं।
अंतिम संदेश
रेशम का कीड़ा अपने ही भीतर से धागा निकालकर अपना संसार बनाता है और अंततः उसी में कैद हो जाता है।
मनुष्य भी अपने ही मन से मोह और आसक्ति के धागे निकालकर अपना संसार बुनता है।
अंतर केवल इतना है कि रेशम के कीड़े को अपना बंधन दिखाई नहीं देता, लेकिन मनुष्य को विवेक मिला है।
इसलिए समय रहते अपने भीतर झाँकिए।
देखिए कहीं हम भी तो अपने ही हाथों से ऐसा कोकून नहीं बना रहे, जिसमें एक दिन स्वयं ही कैद हो जाएँगे?
मोह के धागे जितने मजबूत होंगे, मुक्ति उतनी ही कठिन होगी।
इसलिए जीवन रहते उन धागों को पहचानिए, विवेक से काटिए और अपने कर्मों को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर दीजिए।
क्योंकि अंततः—
“जिसे हम जीवन भर अपना घर समझकर सजाते रहे, हो सकता है वही हमारी सबसे बड़ी कैद बन जाए।”
और शायद जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान यही है—
संसार में रहो, लेकिन संसार को अपने भीतर मत बसने दो।
