रुष्ट पितृ शांति साधना: पितृपक्ष में लोक-साबर मंत्र, विधि और सावधानियाँ
।। ॐ पितृ देवाय नमः ।।
रुष्ट पितृ शांति साधना: पितृपक्ष में लोक-साबर मंत्र, विधि और सावधानियाँ
क्या पितृपक्ष में पितरों का स्मरण केवल श्राद्ध और तर्पण तक सीमित है?
भारतीय सनातन परंपरा में पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का विशेष महत्व है। श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, दान, ब्राह्मण भोजन तथा पूर्वजों का स्मरण—इन सभी परंपराओं का उद्देश्य अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करना माना जाता है।
पितृपक्ष इसी पूर्वज-स्मरण की भावना से जुड़ा विशेष समय है। इस दौरान अनेक परिवार अपनी कुल-परंपरा और कुलाचार के अनुसार पितृकर्म करते हैं।
इसी व्यापक लोक-परंपरा में पितृशांति के लिए कुछ लोक-साबर मंत्र और साधना-विधियां भी प्रचलित रही हैं। इनमें एक मंत्र “पितृ परम पर्वता विराजे…” से प्रारंभ होता है।
हालांकि, उपलब्ध सामग्री के आधार पर इसे किसी प्रमुख वैदिक संहिता या प्रसिद्ध पुराण का प्रमाणित मूल मंत्र बताना उचित नहीं होगा। इसे लोक-साबर अथवा लोक-प्रचलित पितृ साधना के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है।
पितृ शांति के लिए लोक-साबर मंत्र
लोक-परंपरा में प्रचलित मंत्र इस प्रकार दिया जाता है—
“पितृ परम पर्वता विराजे, हम कर जोड़े खड़े सकारे।
होम धूप की होय अग्यारी, पितरदेव दरबार तुम्हारी।
पितर मनावे हरिद्वार में बरकत बरसे, बार-बार मैं अपने गोत्र के पितर मनाऊँ।
सातों-सातहि सिर ही झुकाऊँ।
जो न माने मेरी बात, नरसिंह को झुकाऊँ माथ।
वीर नरसिंह दहाड़ता आवे, मूँछें-पूँछ कोप हिलावे।
हन-हन, हुं-हुं करे हुंकार, प्रेत-पितर पीड़ा फटकार।
कोड़ा मारे श्री हनुमान, सिद्ध होंय सब पूर्ण काज।
दुहाई-दुहाई राजा रामचन्दर महाराज की॥”
यह मंत्र लोक-साबर परंपरा में मिलता है। इसलिए इसके शब्दों और प्रयोग को लोक-आस्था की सामग्री के रूप में समझना चाहिए, न कि इसे वैदिक मंत्र बताकर प्रस्तुत करना चाहिए।
पितृपक्ष में इस लोक-साधना की प्रचलित विधि
लोक-परंपरा में इस प्रयोग के लिए निम्न विधि बताई जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में विधि में अंतर हो सकता है।
1. स्थान की स्वच्छता
सबसे पहले पूजा या साधना के स्थान को साफ करके शांत मन से बैठें।
साधना का मूल भाव भय नहीं बल्कि श्रद्धा और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता होना चाहिए।
2. दीपक प्रज्वलित करना
लोक-विधि में आग्नेय कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व दिशा में तेल का दीपक जलाने की बात कही जाती है। एक दीपक अपने सामने रखने की परंपरा भी बताई जाती है।
यह ध्यान रखना चाहिए कि दीपक हमेशा सुरक्षित स्थान पर रखें और उसे ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखें।
3. नैवेद्य रखना
एक पूरी पर थोड़ी खीर और हलवा रखकर अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करने की परंपरा बताई गई है।
इस अवसर पर अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा अन्य पूर्वजों का नाम और गोत्र स्मरण किया जा सकता है, यदि परिवार की परंपरा में ऐसा किया जाता हो।
4. नारियल रखना
लोक-प्रयोग में एक पानी वाला नारियल पास रखने की बात कही जाती है।
इसके बाद ऊपर दिए गए मंत्र का एक माला जाप करने की परंपरा बताई गई है।
जप के दौरान मन को शांत रखें और पितरों की शांति एवं परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।
5. साधना के बाद
लोक-मान्यता के अनुसार मंत्र-जप पूरा होने के बाद नारियल फोड़ने और पूजा की सामग्री को रातभर उसी स्थान पर रखने की विधि बताई जाती है।
अगले दिन पूरी को
