क्या भगवान शिव का चरणोदक और प्रसाद ग्रहण करना चाहिए? जानिए शास्त्रों का मत
क्या भगवान शिव का चरणोदक और प्रसाद ग्रहण करना चाहिए? जानिए शास्त्रों का मत
प्रस्तावना
सनातन धर्म में भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा गया है। उनकी पूजा, अभिषेक, रुद्राभिषेक, बिल्वपत्र अर्पण तथा प्रसाद ग्रहण की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। किंतु कुछ स्थानों पर यह धारणा सुनने को मिलती है कि भगवान शिव का चरणोदक अथवा प्रसाद ग्रहण नहीं करना चाहिए।
क्या वास्तव में शास्त्रों में ऐसा कोई निषेध है?
आइए, इस विषय को शास्त्रीय दृष्टि से समझने का प्रयास करते हैं।
शिव प्रसाद के संबंध में प्रचलित भ्रम
कुछ लोगों के बीच यह मान्यता प्रचलित है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल या नैवेद्य ग्रहण नहीं करना चाहिए। हालांकि विभिन्न परंपराओं और संप्रदायों में इस विषय पर अलग-अलग मत मिलते हैं।
अनेक शैव ग्रंथों तथा पुराणों में भगवान शिव के प्रसाद और चरणोदक की महिमा का वर्णन मिलता है।
भोजन के भोक्ता महेश्वर
धार्मिक ग्रंथों में एक प्रसिद्ध श्लोक मिलता है—
अन्नं ब्रह्म रसं विष्णुर्भोक्तादेवो महेश्वरः।
एवं ध्यात्वा द्विजो भुङ्क्ते अन्नदोषैर्न लिप्यते॥
अर्थात्—
अन्न ब्रह्मा स्वरूप है, उसका रस विष्णु स्वरूप है और उसके भोक्ता भगवान महेश्वर हैं। इस भाव से भोजन करने वाला व्यक्ति अन्नदोष से मुक्त रहता है।
यह श्लोक भोजन को दिव्यता से जोड़ने और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की शिक्षा देता है।
शिव और समस्त देवताओं की एकत्व भावना
सनातन दर्शन में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को एक ही परम तत्व के विभिन्न स्वरूप माना गया है।
अनेक शास्त्रों में कहा गया है—
शिवाय विष्णुरूपाय, शिवरूपाय विष्णवे।
अर्थात् शिव और विष्णु में कोई वास्तविक भेद नहीं है।
इसी कारण कई आचार्य सभी देवताओं के प्रसाद को ईश्वर की कृपा का प्रतीक मानते हैं।
गंगाजल और शिव का संबंध
भगवान शिव की जटाओं में मां गंगा का निवास बताया गया है।
यदि कोई यह तर्क देता है कि शिव से स्पर्शित जल ग्रहण नहीं करना चाहिए, तो यह विचार गंगाजी की महिमा से भी मेल नहीं खाता, क्योंकि गंगा स्वयं शिव-जटाओं से पृथ्वी पर अवतरित हुई हैं।
इसलिए अनेक भक्त शिवाभिषेक के जल को श्रद्धा से चरणामृत स्वरूप ग्रहण करते हैं।
शिवपुराण में शिव नैवेद्य की महिमा
शिवपुराण के विद्येश्वर संहिता में शिव प्रसाद की महिमा का वर्णन मिलता है—
दृष्ट्वापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरतः।
भुक्त्वा तु शिवनैवेद्यं पुण्यान्यायान्ति कोटिशः॥
अर्थात्—
शिव नैवेद्य के दर्शन मात्र से पाप दूर होते हैं और श्रद्धा से ग्रहण करने पर महान पुण्य प्राप्त होता है।
इसी प्रकार आगे शिव प्रसाद को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करने की प्रशंसा की गई है।
विभिन्न परंपराओं में मतभेद क्यों?
ध्यान देने योग्य बात यह है कि भारत में अनेक धार्मिक परंपराएं और संप्रदाय हैं।
कुछ मंदिरों में—
- शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल भक्तों को वितरित किया जाता है।
- कहीं केवल चरणामृत दिया जाता है।
- कुछ परंपराओं में शिवलिंग पर सीधे अर्पित नैवेद्य के संबंध में विशेष नियम भी बताए गए हैं।
इसलिए किसी विशेष परंपरा का पालन करते समय उस मंदिर की परंपरा और अपने गुरु या आचार्य के निर्देशों का सम्मान करना उचित माना जाता है।
शिव प्रसाद का आध्यात्मिक महत्व
शिव प्रसाद केवल भोजन नहीं है, बल्कि ईश्वर की कृपा का प्रतीक माना जाता है।
प्रसाद ग्रहण करते समय भाव होना चाहिए—
- अहंकार का त्याग
- ईश्वर के प्रति कृतज्ञता
- श्रद्धा और भक्ति
- समर्पण
यही भावना प्रसाद को साधारण भोजन से अलग बनाती है।
शैव ग्रंथों और अनेक धार्मिक परंपराओं में भगवान शिव के प्रसाद और चरणोदक की महिमा का वर्णन मिलता है। हालांकि विभिन्न संप्रदायों और मंदिरों में कुछ व्यवहारिक नियम अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए अपने गुरु, परंपरा या मंदिर व्यवस्था के अनुसार आचरण करना उचित है।
सनातन धर्म का मूल संदेश यह है कि श्रद्धा, भक्ति और शुद्ध भाव से ग्रहण किया गया प्रसाद ईश्वर की कृपा का माध्यम बनता है। भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और सम्मान ही इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है।
हर हर महादेव!
विशेष टिप्पणी: इस विषय में विभिन्न संप्रदायों और परंपराओं के मत भिन्न हो सकते हैं। इसलिए अपने गुरु, आचार्य या मंदिर परंपरा के निर्देशों का सम्मान करना सर्वोत्तम माना जाता है।
