सोरायसिस (त्वचा विकार): आयुर्वेदिक दृष्टिकोण, आहार और सावधानियां
सोरायसिस (त्वचा विकार): आयुर्वेदिक दृष्टिकोण, आहार और सावधानियां
सोरायसिस (Psoriasis) एक दीर्घकालिक सूजन संबंधी त्वचा रोग है, जिसमें त्वचा पर लाल चकत्ते, खुजली, शुष्कता और पपड़ी बनने जैसी समस्या हो सकती है। इसके लक्षण समय-समय पर कम या अधिक हो सकते हैं।
आयुर्वेद में विभिन्न त्वचा विकारों का वर्णन किया गया है और रोगी की प्रकृति, लक्षण तथा दोषों के आधार पर उपचार की योजना बनाई जाती है। पारंपरिक चिकित्सा में गंधक रसायन और खादिरारिष्ट जैसी औषधियों का उल्लेख त्वचा संबंधी समस्याओं के संदर्भ में मिलता है।
हालांकि, सोरायसिस के उपचार में किसी भी आयुर्वेदिक औषधि की प्रभावशीलता को आधुनिक वैज्ञानिक उपचार के बराबर प्रमाणित नहीं माना जा सकता। उपलब्ध शोध में कई complementary और herbal treatments के प्रमाण सीमित या असंगत हैं।
1. गंधक रसायन वटी
पारंपरिक उपयोग
गंधक रसायन का आयुर्वेदिक चिकित्सा में विभिन्न त्वचा संबंधी समस्याओं में उपयोग बताया जाता है। पारंपरिक रूप से इसे खुजली, त्वचा की असुविधा और कुछ त्वचा विकारों में उपयोग किए जाने वाले योगों में शामिल किया जाता है।
लेकिन इसे सोरायसिस का प्रमाणित इलाज या रोग को जड़ से समाप्त करने वाली औषधि नहीं माना जाना चाहिए।
सेवन के संबंध में
कुछ आयुर्वेदिक चिकित्सकीय पद्धतियों में इसकी मात्रा व्यक्ति की स्थिति के अनुसार निर्धारित की जाती है। 75 वर्ष की आयु में इसे स्वयं से निश्चित मात्रा में शुरू करने के बजाय योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श करना बेहतर है।
विशेष रूप से यह जानना जरूरी है कि रोगी पहले से कौन-कौन सी दवाएं ले रहा है तथा किडनी और लिवर की स्थिति कैसी है।
2. खादिरारिष्ट
खादिरारिष्ट का पारंपरिक आयुर्वेदिक उपयोग त्वचा संबंधी विकारों में बताया जाता है। इसे कुछ परंपराओं में खुजली और त्वचा संबंधी लक्षणों के लिए प्रयोग किया जाता है।
महत्वपूर्ण सावधानी
खादिरारिष्ट एक किण्वित (fermented) आयुर्वेदिक तैयारी है, इसलिए इसमें स्वाभाविक रूप से कुछ मात्रा में अल्कोहल बन सकता है। इसके अलावा इसमें प्रयुक्त शर्करा/गुड़ को देखते हुए मधुमेह वाले व्यक्ति में विशेष सावधानी आवश्यक हो सकती है।
यदि रोगी पहले से कोई दवा ले रहा है, तो खादिरारिष्ट शुरू करने से पहले चिकित्सक को इसकी जानकारी देना चाहिए।
3. 75 वर्ष की आयु में विशेष सावधानियां
वृद्धावस्था में शरीर दवाओं को अलग तरीके से अवशोषित और बाहर निकाल सकता है। इसलिए किसी भी औषधि की मात्रा और अवधि व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार तय की जानी चाहिए।
विशेष रूप से ध्यान दें:
- मधुमेह होने पर खादिरारिष्ट के उपयोग पर चिकित्सकीय सलाह लें।
- किडनी या लिवर की बीमारी होने पर बिना परामर्श औषधि न लें।
- रक्त को पतला करने वाली या अन्य नियमित दवाएं चल रही हों तो चिकित्सक को अवश्य बताएं।
- कई औषधियों या supplements को एक साथ शुरू करने से बचें।
- किसी औषधि के बाद खुजली, सूजन, पेट की समस्या या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें तो उसका सेवन रोककर चिकित्सकीय सलाह लें।
हर्बल और complementary products में drug interactions तथा गुणवत्ता/contamination से जुड़ी चिंताएं भी हो सकती हैं।
4. सोरायसिस में आहार
आहार का प्रभाव हर व्यक्ति में अलग हो सकता है। किसी एक खाद्य पदार्थ को सभी सोरायसिस रोगियों के लिए अनिवार्य रूप से नुकसानदायक बताने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।
फिर भी संतुलित आहार अपनाना उपयोगी है।
सीमित करें
- अत्यधिक तला-भुना भोजन
- बहुत अधिक processed food
- अत्यधिक शराब
- बहुत अधिक मिर्च-मसाले वाला भोजन, यदि इससे लक्षण बढ़ते हों
- ऐसे खाद्य पदार्थ जिनसे व्यक्ति को बार-बार व्यक्तिगत रूप से लक्षण बढ़ते हुए दिखाई दें
भोजन में शामिल करें
- हरी पत्तेदार सब्जियां
- मौसमी फल
- साबुत अनाज
- पर्याप्त प्रोटीन
- पर्याप्त पानी
नीम, गिलोय या त्रिफला जैसे औषधीय पदार्थों का नियमित सेवन भी चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही करना बेहतर है। हर्बल उपचारों के लिए सोरायसिस में उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं।
5. आयुर्वेदिक दृष्टि से संभावित संयोजन
कुछ आयुर्वेदिक चिकित्सक सोरायसिस में गंधक रसायन के साथ अन्य पारंपरिक योगों, जैसे महामंजिष्ठादि क्वाथ या पंचतिक्त घृत गुग्गुलु, का उपयोग रोगी की प्रकृति और लक्षणों के अनुसार कर सकते हैं।
लेकिन इन सभी औषधियों को एक साथ शुरू करना उचित नहीं है। रोगी की उम्र, बीमारी की गंभीरता, अन्य दवाओं और किडनी-लिवर की स्थिति को देखते हुए योग्य चिकित्सक ही संयोजन निर्धारित करें।
सोरायसिस के लिए आधुनिक चिकित्सा में topical medicines, phototherapy और आवश्यकता के अनुसार systemic medicines उपलब्ध हैं।
6. त्वचा की देखभाल
सोरायसिस में त्वचा का सूखापन और पपड़ी खुजली को बढ़ा सकती है। इसलिए त्वचा को नियमित रूप से moisturize रखना उपयोगी हो सकता है।
नहाने के बाद उपयुक्त moisturizer या emollient लगाने से त्वचा में नमी बनाए रखने में मदद मिल सकती है। AAD भी psoriasis में moisturizers सहित topical treatments के उपयोग का उल्लेख करता है।
किसी भी आयुर्वेदिक तेल, लेप या घरेलू नुस्खे को बड़े क्षेत्र में लगाने से पहले चिकित्सक की सलाह लेना बेहतर है, खासकर यदि त्वचा पर घाव या संक्रमण हो।
7. कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?
यदि सोरायसिस तेजी से बढ़ रहा हो, शरीर के बड़े हिस्से में फैल रहा हो, घाव से मवाद या खून आ रहा हो या उपचार के बावजूद लगातार समस्या बनी हुई हो, तो त्वचा रोग विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए।
यदि साथ में जोड़ों में दर्द, सूजन या सुबह के समय जोड़ों में जकड़न रहती है, तो इसकी जानकारी भी डॉक्टर को दें, क्योंकि सोरायसिस के साथ psoriatic arthritis भी हो सकता है।
गंधक रसायन और खादिरारिष्ट का आयुर्वेद में त्वचा संबंधी समस्याओं के संदर्भ में पारंपरिक उपयोग मिलता है, लेकिन इन्हें सोरायसिस का निश्चित या प्रमाणित इलाज नहीं कहा जा सकता।
विशेष रूप से 75 वर्ष की आयु में उपचार की मात्रा और अवधि व्यक्ति की जांच के बाद तय करना अधिक सुरक्षित है। आधुनिक चिकित्सा में भी सोरायसिस के कई प्रभावी उपचार उपलब्ध हैं और 65 वर्ष से अधिक आयु में उपचार की नियमित समीक्षा की सलाह दी जाती है।
यदि कोई व्यक्ति आयुर्वेदिक उपचार को अपनी वर्तमान चिकित्सा के साथ लेना चाहता है, तो अपने त्वचा रोग विशेषज्ञ और योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक—दोनों को सभी दवाओं और supplements की जानकारी देना उचित है।
