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दुर्गा सप्तमी आज 

दुर्गा सप्तमी आज

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दुर्गा सप्तमी (जिसे महासप्तमी भी कहा जाता है) हिंदू धर्म के सबसे पवित्र त्योहारों में से एक, शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा का सातवां दिन है। इस विशेष दिन से ही देवी दुर्गा की मुख्य और भव्य पूजा-अर्चना के अनुष्ठानों की औपचारिक शुरुआत होती है।
इस वर्ष 2026 में, महासप्तमी का यह पावन पर्व 18 अक्टूबर 2026 (रविवार) को मनाया जा रहा है (कुछ क्षेत्रीय पंचांगों के अनुसार इसके अनुष्ठान 17 अक्टूबर से भी शुरू होंगे)।
महासप्तमी कब मनाई जाती है?
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यह पर्व मुख्य रूप से हिंदू कैलेंडर के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर में यह दिन हर साल सितंबर या अक्टूबर के महीने में आता है। नवरात्रि के पहले छह दिन आध्यात्मिक तैयारी के होते हैं और सातवें दिन यानी सप्तमी से मुख्य उत्सव का आगाज होता है।
दुर्गा सप्तमी का महत्व और मुख्य अनुष्ठान
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धार्मिक और पौराणिक दृष्टिकोण से महासप्तमी का अत्यधिक महत्व है:
• मां कालरात्रि की पूजा: नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा के सबसे संहारक और शक्तिशाली स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। मां कालरात्रि काल का नाश करने वाली और अपने भक्तों को अकाल मृत्यु व नकारात्मक शक्तियों से बचाने वाली “शुभंकरी” देवी हैं।
• बुराई पर अच्छाई की जीत: मान्यता है कि इसी दिन देवी दुर्गा ने महिषासुर नाम के भैंस रूपी राक्षस का वध करने के लिए युद्ध का भयानक रूप धारण किया था, जो हमें सिखाता है कि आंतरिक साहस से हर बुराई को मिटाया जा सकता है।
• नवपत्रिका स्नान (कोला बौ पूजा): सप्तमी की सुबह नौ विशेष पौधों की पत्तियों (जैसे केला, हल्दी, बेल, अनार आदि) को एक साथ बांधकर नदी के पवित्र जल में स्नान कराया जाता है। इसे ‘नवपत्रिका’ या ‘कोला बौ’ कहा जाता है, जो प्रकृति के नौ रूपों में साक्षात मां दुर्गा के अवतरण का प्रतीक है।
• प्राण प्रतिष्ठा और बोधन: इस दिन वेदों और तांत्रिक विधियों के मंत्रोच्चार से पूजा पंडालों और घरों में देवी की प्रतिमा के नेत्र खोलकर उनमें चेतना का संचार (प्राण प्रतिष्ठा) किया जाता है。 इसके बाद ही आम भक्तों के लिए मां के दर्शन और महापूजा की शुरुआत होती है।
• भगवान राम से संबंध (अकाल बोधन): पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने रावण से युद्ध जीतने के लिए शरद ऋतु में मां दुर्गा का असामयिक आह्वान (अकाल बोधन) किया था और सप्तमी के दिन से ही उनकी पूजा गहन चरण में पहुंची थी।
पौराणिक कथाएं
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1 मां कालरात्रि की कथा (दुष्टों का संहार) पौराणिक कथा के अनुसार, शुम्भ, निशुम्भ और रक्तबीज नाम के राक्षसों ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। इससे परेशान होकर सभी देवता भगवान शिव के पास गए और रक्षा की गुहार लगाई। शिव जी के अनुरोध पर आदि शक्ति मां दुर्गा ने अपने तेज से देवताओं की रक्षा के लिए रूप धारण किया।
जब मां दुर्गा ने शुम्भ-निशुम्भ के सेनापतियों (चण्ड और मुण्ड) का वध कर दिया, तो युद्ध के मैदान में रक्तबीज आया। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से खून की एक भी बूंद जैसे ही धरती पर गिरेगी, वैसे ही उसकी हर बूंद से एक नया और उतना ही शक्तिशाली रक्तबीज पैदा हो जाएगा।
इस कारण जब भी मां दुर्गा उस पर प्रहार करतीं, उसके खून से हजारों नए राक्षस खड़े हो जाते। तब मां दुर्गा ने अत्यंत क्रोध में आकर अपने माथे से मां कालरात्रि (काली) को प्रकट किया।
• मां कालरात्रि का स्वरूप भयानक था—गले में नरमुंडों की माला, बिखरे हुए बाल और तीन आंखें।
• मां दुर्गा ने कालरात्रि से कहा कि वे रक्तबीज पर प्रहार करते समय उसका खून धरती पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लें।
• इसके बाद, जब मां दुर्गा ने रक्तबीज का वध किया, तो मां कालरात्रि ने उसका सारा खून पी लिया और उसका अंत किया। इसी कारण उन्हें कालरात्रि या शुभंकरी कहा गया।
2 भगवान श्रीराम का ‘अकाल बोधन’
एक और प्रचलित कथा के अनुसार, लंका युद्ध के दौरान जब रावण की शक्ति के आगे वानर सेना कमजोर पड़ने लगी, तब विभीषण ने भगवान श्रीराम को शक्ति की देवी मां दुर्गा की पूजा करने की सलाह दी।
चूंकि देवी की मुख्य पूजा वसंत ऋतु (चैत्र नवरात्रि) में होती थी, लेकिन श्रीराम को युद्ध के मैदान में तुरंत शक्ति की आवश्यकता थी, इसलिए उन्होंने शरद ऋतु में मां दुर्गा का असामयिक आह्वान किया, जिसे ‘अकाल बोधन’ कहा जाता है।
• श्रीराम ने प्रतिपदा (पहले दिन) से लेकर षष्ठी (छठे दिन) तक कठिन तपस्या की।
• महासप्तमी के दिन ही मां दुर्गा श्रीराम की भक्ति से प्रसन्न हुईं और उनके संकल्प को स्वीकार किया।
• इसके बाद अष्टमी और नवमी को विशेष पूजा हुई, जहां श्रीराम ने अपनी आंख (नीलकमल के रूप में) मां के चरणों में अर्पित करने का प्रयास किया था, जिससे प्रसन्न होकर मां ने उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया।
राजेन्द्र गुप्ता,
ज्योतिषी और हस्तरेखाविद

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